ये ‘आरक्षण’ अगर मिल भी जाए तो… क्या है ?

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ये ‘आरक्षण’ अगर मिल भी जाए तो… क्या है ?

योगेश भट्ट
आर्थिक आधार पर आरक्षण सुनने में अच्छा जरूर लगता है लेकिन अपने देश में यह व्यवहारिक हो पाएगा, इसमें संदेह है। आर्थिक आधार पर दस फीसदी आरक्षण के बाद देश की तकरीबन 95 फीसदी आबादी किसी न किसी तरह के आरक्षण के दायरे में आ जाएगी। पांच फीसदी आबादी जो शेष रह जाती है, यह वो आबादी है जिसके पास देश की साठ फीसदी से अधिक संपत्ति है। अब सवाल उठता है कि आरक्षण आखिर क्यों और किस लिए ? जब अमीरी और गरीबी का फासला दिनोदिन बढ़ता जा रहा हो, बेरोजगारों की संख्या बेतहाशा बढ़ रही हो, निजी क्षेत्र में छंटनियां हो रही हो और सरकारी नौकरियां तकरीबन खत्म हो चुकी हों तब आर्थिक आरक्षण के कोई मायने हैं भी या सिर्फ सियासत ?

समझ नहीं आता कि जब 12 करोड़ हाथ रोजगार मांग रहे हों और देश के साधन संसाधन सीमित हाथों में कैद होते जा रहे हों तो ऐसे में आर्थिक आरक्षण कैसे गेम चेंजर होगा ? सरकार पर सियासत का आरोप है, लेकिन वक्त ऐसा है कि विपक्षी कांग्रेस और दूसरे राजनैतिक दल भी कुछ कहने की स्थिति में नहीं हैं । सरकार सोच रही है कि चुनाव से पहले उसने मास्टर स्ट्रोक खेला है, लेकिन सियासत के खेल में कोई दावा नहीं किया जा सकता । देश में अर्थव्यवस्था और रोजगार के जो हालात हैं उसमें सरकार का यह दाव उल्टा भी पड़ सकता है ।

आर्थिक आरक्षण की राह हालांकि अभी आसान नहीं है । संसद से विधेयक पास होते ही उसे उच्चतम न्यायालय में चुनौती भी दी जा चुकी है । सब कुछ ठीक चला और उच्चतम न्यायालय का एतराज नहीं रहा तो दस फीसदी आर्थिक आधार पर आरक्षण के जो मानक सरकार ने रखे हैं, उसके बाद लगभग 35 फीसदी जनता और आरक्षण की परिधि में आ जाएगी।

चलिये सबसे पहले बात करते हैं कि आर्थिक आरक्षण क्यों ? आरक्षण यानी वर्ग विशेष के लिए विशेष अवसर, विशेष अवसर से तात्पर्य यहां आर्थिक, सामाजिक और शैक्षिक प्रगति से है तो वहीं वर्ग विशेष का तात्पर्य तरक्की की दौड़ में पीछे छूट चुके वर्ग से है । देश में रोजगार और शिक्षा के क्षेत्र में आर्थिक आरक्षण की मांग तकरीबन ढाई दशक से उठ रही है जिसका प्रमुख कारण यह है कि सामाजिक विषमता के साथ ही देश में आर्थिक विषमता भी बढ़ी है । आर्थिक आधार पर आरक्षण को हमारा संविधान इजाजत नहीं देता है, इसलिए अभी तक जो भी कोशिशें हुई वह नाकाम ही रहीं ।

इससे इंकार नहीं किया जा सकता कि आरक्षण का सीधा सवाल दरअसल आर्थिक विषमता यानी अर्थव्यवस्था में आम आदमी की हिस्सेदारी और रोजगार से जुड़ा है। और हकीकत यह है कि देश में दोनो की स्थिति भयावह है । आर्थिक आरक्षण के मद्देनजर बात करें तो स्थितियां इतनी आसान नहीं हैं जितनी दिखाने और जताने की कोशिश की जा रही है । भारत ने तेजी से आर्थिक तरक्की तो की है लेकिन इस दौरान वित्तीय असमानता भी उतनी ही तेजी से बढ़ी है ।

इंडिया इन इक्वैलिटी रिपोर्ट 2018 के मुताबिक भारत दुनिया के सबसे असमान देशों में है, जहां असमानता का पैमाना कमाई, खर्च और संपत्ति है । देश में जिन मुट्ठीभर लोगों के हाथ में संपत्ति है, उनकी अमीरी में तेजी से इजाफा हो रहा है । वित्तीय सेवाओं के क्षेत्र में दुनिया की नामचीन कंपनी क्रेडिट सुईस के अनुसार भारत की 53 फीसदी दौलत देश के एक फीसदी सबसे अमीर लोगों के पास है ।

देश की कुल 68.6 फीसदी संपत्ति पांच फीसदी लोगों के पास और 76.3 प्रतिशत दस फीसदी अमीर वर्ग के पास है । इसे चौंकाने वाला तथ्य ही कहा जाएगा कि देश की 90 फीसदी आबादी कुल संपत्ति के मात्र 23.7 प्रतिशत में ही जद्दोजेहद कर रही है । गरीब और गरीबी की तो बात ही बेमानी है । सबसे गरीब जनता की देश की संपत्ति में हिस्सेदारी मात्र 4.1 प्रतिशत है । इन आंकड़ों की कसौटी पर देखा जाए आर्थिक आरक्षण कोई उम्मीद नहीं जगाता बल्कि एक निराशा पैदा करता है । सवाल उठता है कि सरकार ने आर्थिक आधार पर आरक्षण के जो मानक रखे हैं वे यदि लागू होते भी हैं तो लाभ किस वर्ग को होगा ?

दरअसल सारा खेल सरकार की नीतियों और नीयत का ही है । सरकारों की नीतियां हमेशा अमीरों के लिए बेहतर और गरीबों के लिए बदतर साबित हुई हैं । गरीब तो व्यवस्था में और गरीब होता हुआ कब हाशिये पर चला गया पता ही नहीं चला । जरा गौर कीजिये, वर्ष 1991 में पचास प्रतिशत गरीबों के पास 9 फीसदी संपत्ति थी जो 2012 तक आते-आते 5.3 प्रतिशत रह गई। जबकि दूसरी ओर वर्ष 1991 में एक फीसदी अमीरों के पास सत्रह फीसदी संपत्ति थी, जो 2012 तक बढ कर 28 फीसदी पहुच गई । वर्ष 2017 में यह आंकड़ा बढ़ कर 53 फीसदी तक पहुंच चुका है । देश में अमीर कितनी तेजी से तरक्की की सीढ़ियां चढ़े हैं और गरीब कितनी तेजी से गिरे हैं, यह इसका प्रमाण है ।

अमीरी-गरीबी के फासले में आज भारत अमेरिका से कई आगे है । अमेरिका में भी एक फीसदी आबादी के पास कुल संपत्ति का 37.3 प्रतिशत हिस्सा है । क्रेडिट सुईस के मुताबिक 15 वर्षों में भारत की दौलत में 2.28 खरब डालर की बढ़ोतरी हुई जिसका 61 फीसदी हिस्सा देश के एक फीसदी अमीरों की जेब में गया है । अकेले वर्ष 2017 के आंकड़ों पर गौर करें तो उस वर्ष जितनी संपत्ति पैदा हुई उसका 73 फीसदी मात्र एक प्रतिशत बड़े अमीरों को मिला । इन अमीरों की दौलत में उस एक वर्ष में 20.9 लाख करोड़ रुपये का इजाफा हुआ ।

अब बात करते हैं रोजगार की, जो देश की बड़ी चिंता भी है और चुनौती भी । आरक्षण के लिहाज से भी देखा जाए तो इसका रोजगार से भी सीधा संबंध है । लेकिन अपने देश में रोजगार की स्थिति बेहद दयनीय बनी हुई है । सरकार दावा करती है कि उसकी नीतियों से रोजगार के अवसर बढ़े हैं, लेकिन सरकार के पास इसका कोई आंकड़ा नहीं होता । आंकड़ा यह है कि देश में हर साल तकरीन डेढ़ करोड़ बेरोजगार नया बढ़ रहा है । सरकारी नौकिरयां समूह घ में खत्म हो गयी हैं और समूह ग में कम होती जा रही हैं । मतलब आरक्षण का लाभ मिले तो मिले कहां जब सरकारी क्षेत्र में अवसर नहीं के बराबर हो गए हैं ।

बेरोजगारी पर जितने भी सर्वेक्षण आए हैं उनमें आंकड़े भले ही अलग हों लेकिन एक संकेत हर सर्वेक्षण में सामने आया है कि देश में रोजगार के हालात बदतर होते जा रहे हैं । एक अधिकारिक आंकड़े के मुताबिक देश में लगभग बारह करोड़ युवाओं के पास कोई रोजगार नहीं है । रोजगार सृजन के सरकारी दावों के बीच बेरोजगारी की दर दो दशकों के सर्वोच्च स्तर, सोलह फीसदी पर पहुंच गई है । सेंटर फार मानीटरिंग इंडियन इकानामी ने हाल ही में अपनी एक रिपोर्ट में बढ़ती बेरोजगारी के आंकड़े जारी करते हुए कहा कि वर्ष 2018 में 1 करोड़ दस लाख लोगों ने नौकरी गवांई है । अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के मुताबिक पिछले चार वर्षों के दौरान देश में प्रतिदिन तकरीबन साढ़े पांच सौ नौकरियां खत्म हुई हैं । सक्रिय रूप से नौकरी तलाशने वाले बेरोजगारों की तादाद तीन करोड़ के पार होने जा रही है ।

अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय के स्कूल आफ लिबरल स्टडीज ने हाल ही में स्टेट आफ वर्किंग इंडिया 2018 शीर्षक से एक सर्वे रिपोर्ट जारी की । इसके अनुसार भी वर्ष 2015 में जो बेरोजगारी दर पांच प्रतिशत थी वह 2018 में सोलह प्रतिशत तक पहुंच चुकी है । जीडीपी में वृद्धि के बावजूद भी रोजगार में वृद्धि नहीं हो रही है । रिपोर्ट के मुताबिक बेरोजगारी की दर बढ़ने के पीछे दो मुख्य कारण, रोजगार सृजन की धीमी रफ्तार और उद्योगों में मानव शक्ति में कटौती है। रिपोर्ट यह भी बताती है कि देश में रोजगार के क्षेत्र में काम कर रहे लोगों के वेतन में भारी असमानता है । ज्यादातर लोगों का मासिक वेतन दस हजार रुपये से कम है ।

सबसे ज्यादा चिंताजनक बात यह है कि पढ़े-लिखे बेरोजगारों की तादाद सब से ज्यादा है । बेराजगारों में कुल 42 फीसदी (14 करोड़ से अधिक) बेरोजगार 25 से 29 वर्ष की आयु के हैं, जो रोजगार की तलाश कर रहे हैं । तकनीकी शिक्षा हासिल कर चुके 16 फीसदी युवा भी बेराजगारों की कतार में हैं । रोजगार से ही जुड़ा चिंताजनक पहलू यह है कि निकट भविष्य में जो रोजगार आने भी वाला है, वह भी बहुत अच्छा रोजगार नहीं होने जा रहा है । आईएलओ की रिपोर्ट पर गौर करें तो देश में आने वाले दिनों में रोजगार के हालात और बदतर होने वाले हैं ।

सबसे बड़ी समस्या पूर्ण रोजगार की होने जा रही है । इस रिपोर्ट के मुताबिक इस वर्ष पूर्ण रोजगार की दर मात्र 3.5 फीसदी रहेगी । इसके मुताबिक 2019 तक 53.5 करोड़ लोगों के पास रोजगार तो होगा, जिसमें से 39.86 करोड़ लोगों के पास दोयम दर्जे का रोजगार होगा । जिससे वे बमुश्किल अपना जीवन यापन ही कर सकेंगे ।
अब सवाल यह उठता है कि जिस आर्थिक आधार पर आरक्षण को मास्टर स्ट्रोक और गैंम चेंजर कहा जा रहा है, क्या इससे यह भयावह तस्वीर बदल जाएगी ? या इसका हश्र भी वही होगा जैसा संविधान प्रद्त्त सामाजिक आधार पर दिए जाने वाले आरक्षण का हुआ है ?

पूरा देश जानता है कि संविधान में सामाजिक आधार पर आरक्षण की व्यवस्था वंचित तबके के उत्थान के लिए की गई थी, लेकिन आज राजनीति ने इस तबके को वोटबैंक में तब्दील कर दिया है । क्या गारंटी है कि आर्थिक आधार पर आरक्षण की परिणति भी ऐसी ही नहीं होगी ? नीति नियंताओं को समझना चाहिए कि जरूरी नहीं कि सियासी समीकरणों के लिहाज से लिए गए फैसले का नतीजा मनमुताबिक निकले । जिस तरह के हालात हैं उनमें आर्थिक आरक्षण के मुद्दे पर सरकार का हालिया फैसला जोखिम भरा भी हो सकता है ।

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