ख्यातिप्राप्त सांस्कृतिक संस्था पर्वतीय कला केंद्र दिल्ली के स्वर्ण जयंती वर्ष पर विविध आयोजन

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ख्यातिप्राप्त सांस्कृतिक संस्था पर्वतीय कला केंद्र दिल्ली के स्वर्ण जयंती वर्ष पर विविध आयोजन
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सी एम पपनै

नई दिल्ली 21 जनवरी।
राष्ट्रीय रंगमंच के जानेमाने संगीत निर्देशक रहे स्व. मोहन उप्रेती व उत्तराखंड के अनेको प्रबुद्ध प्रवासियों द्वारा सन 1968 दिल्ली प्रवास मे स्थापित सांस्कृतिक संस्था पर्वतीय कला केंद्र दिल्ली 29, 30 व 31 जनवरी को दिल्ली के मंडीहाउस स्थित एल टी जी सभागार मे अपनी स्थापना के 50 वर्ष पूर्ण होने पर भव्य स्वर्ण जयंती वर्ष मना रहा है।

इस अवसर पर संस्था से निरंतर जुड़े रहे कलाकारों, दिल्ली प्रवास मे उत्तराखंड की लोकसंस्कृति को विगत कई दशकों से नित नए आयाम दे रही संस्थाओं व प्रसिद्ध लोकगायकों को सम्मानित किया जाऐगा।

पर्वतीय कला केंद्र स्व. ब्रजेन्द्र लाल साह रचित व स्व. मोहन उप्रेती द्वारा संगीतवद्ध उत्तराखंड का सुप्रसिद्ध गीत नाट्य रसिक रमोल का मंचन करेगा। इस गीत नाट्य का निर्देशन अमित सक्सेना व संगीत संयोजन डॉ पुष्पा बग्गा कर रही हैं।

उत्तराखंड की दिल्ली प्रवास मे स्थापित व सक्रिय सांस्कृतिक संस्थाओं उत्तराखंड फिल्म एवं नाट्य संस्थान, पर्वतीय लोक कला मंच, रूद्र वीणा ग्रुप (शिव दत्त पन्त संचालित संस्था), रमेश एवं पार्टी, भुवन रावत व आशा नेगी के लोकनृत्य, गीत व संगीत आधारित कार्यक्रम भी मंचित किए जाऐंगे।

राष्ट्रीय व अन्तराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त सांस्कृतिक संस्था पर्वतीय कला केंद्र भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा सन 1983 से रंगमंडल का दर्जा प्राप्त सांस्कृतिक संस्था है।

सन 1968 से 1980 तक इस संस्था ने उत्तराखण्ड के लोकनृत्य, गीत व संगीत आधारित कार्यक्रमो को बड़े आधुनिक रंगमंच पर मंचित कर न सिर्फ मध्य हिमालय उत्तराखंड की सशक्त पारम्परिक लोकसंस्कृति व लोककला को पहचान दिलवाई, हास की कगार पर खड़ी इस लोकविधा को स्मृद्ध भी किया। आधुनिक रंगमंच की दुनिया ने उत्तराखंड की इस नायाब लोकसंगीत, नृत्य व लोकधुनों की भूरी-भूरी प्रशंसा की। पर्वतीय कला केंद्र को इस क्षेत्र मे प्रशंशनीय कार्य करने पर ख्याति मिली। यह देश का एक मात्र सांस्कृतिक दल है जो गीत नाट्य के क्षेत्र मे कार्यरत है।

1980 मे पर्वतीय कला केंद्र ने उत्तराखंड की प्रेमगाथा राजुला मालूशाही को स्थानीय बोली मे गीत नाट्य शैली मे मंचित कर रंगमंच जगत के विशेषज्ञयों का ध्यान आकर्षित किया। अजुवा बफौल जैसी सशक्त बीरगाथा व उत्तराखंड की रामलीला के भागों धनुष यज्ञ व सीता बनवास का मंचन कर पर्वतीय कला केंद्र ने 1983 मे रंगमंडल का दर्जा हासिल किया व इसी वर्ष पांच यूरोपीय देशों का तीन माह का दौरा 18 कलाकारों के साथ व 1988 मे 24 कलाकारों के साथ उत्तरी कोरिया, चीन व थाईलैंड का 18 दिवसीय दौरा भारतीय सांस्कृतिक सम्बन्ध परिषद के सौजन्य से कर बड़े अंतरराष्ट्रीय आयोजनों मे भारत का प्रतिनिधित्व करने का गौरव हासिल किया। 1971 मे केंद्र ने सिक्कम का दौरा कर विदेशी धरती पर उत्तराखंड की लोकसंस्कृति की अलख जगाने की शुरुआत कर डाली थी।

पर्वतीय कला केंद्र द्वारा उत्तराखंड की मंचित चर्चित लोकगाथाओ मे महाभारत (गढ़वाल की पांडव जागर पर आधारित लोकगाथा), रसिक रमोल, जीतू बगड़वाल, हिलजात्रा, भाना गंगनाथ, रामी, गोरिया, नंदादेवी, गोरीधना, हरूहित मुख्य रही हैं। मंचित लोकगाथाओं का आलेख ब्रजेन्द्र लाल साह, संगीत निर्देशन मोहन उप्रेती व निर्देशन वी एम शाह, प्रैम मटियानी, सुभाष उदगाता, एम के रैना ने किया था।

पचास वर्षों की केंद्र की यात्रा मे अन्य चर्चित नाटकों व गाथाओं मे मुख्य रूप से मंचित इंदर सभा, अमीर खुसरो, मेघदूत, आजादी की 40वी वर्षगांठ पर ‘वंदेमातरम’, कुली बेगार, कगार की आग, धरमदास, वीर चन्द्रसिंह गढ़वाली, पहाड़ नै की काथ, अष्टवक्र अन्य अनेकों मंचन रहे जिनका नाट्य व संगीत निर्देशन रमेश बथेजा, लोकेंद्र त्रिवेदी, सोनार चंद, राम जी बाली, अमित सक्सेना, डॉ पुष्पा बग्गा, डॉ गोविंन्द पांडे, भगवत उप्रेती व नईमा खान उप्रेती ने किया।

केन्द्र की अनेकों लोकगाथाओं व अन्य कार्यक्रमो का राष्ट्रीय प्रसारण दूरदर्शन व आकाशवाणी से भी प्रसारित होता रहा हैं। देश के अनेकों महानगरों, शहरों व कस्बो मे केंद्र ने सांस्कृतिक व लोकगाथाओं के कार्यक्रम मंचित कर ख्याति अर्जित की है।

पचास वर्षों तक निरंतर उत्तराखंड की लोकसंस्कृति के उत्थान हेतु कटिबद्ध रही पर्वतीय कला केंद्र दिल्ली का स्वर्ण जयंती वर्ष पर आयोजित सम्मान समारोह, उत्तराखंड की आमंत्रित सांस्कृतिक संस्थाओं के कार्यक्रम व संगीतमय लोकगाथा रसिक रमोल, गीत नाट्य का मंचन इस संस्था की ख्याति व कटिबद्धता का एक और चरम शिखर आंका जायेगा।

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