उत्तराखंड की फिल्म, रंगमंच, साहित्य व सामाजिक सदभाव के हितार्थ आयोजित ‘जागिजावा’ विचार गोष्ठी सम्पन्न।

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उत्तराखंड की फिल्म, रंगमंच, साहित्य व सामाजिक सदभाव के हितार्थ आयोजित ‘जागिजावा’ विचार गोष्ठी सम्पन्न।
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सी एम पपनैं

नई दिल्ली, 4 फरवरी।
उत्तराखंड फिल्म कलाकार संगठन द्वारा गढ़वाल भवन में उत्तराखंड फिल्म कलाकार, संस्कृति, साहित्य व समाज हितार्थ विचार गोष्ठी ‘जागिजावा’ का सफल आयोजन संस्था की अध्यक्षा सुशीला रावत की अध्यक्षता व मंचासीन डॉ स्वर्ण रावत, डॉ कालेश्वरी व डॉ हरिसुमन बिष्ट के सानिध्य मे सम्पन्न हुआ।

विचार गोष्ठी में न सिर्फ दिल्ली प्रवास बल्कि उत्तराखंड की वर्तमान में हास व अभाव की मार झेल रहे रंगमंच, साहित्य, फिल्म व सामाजिक सदभाव पर प्रबुद्ध जनो ने विशेष रूप से चिंता व्यक्त की व समस्याओ के निराकरण पर व उत्थान हेतु सारगर्भित विचार रखे।

वक्ताओं ने व्यक्त किया कि उत्तराखंड के प्रत्येक क्षेत्र मे संगठन बने हुए हैं, काम भी हो रहा है लेकिन इन सबका आपस मे एका व सामंजस्य न होने से ये सब बिखर कर एक से दो व दो से चार की संख्या मे बढ़ रहे हैं। एकता के अभाव मे हम अन्य बाहरी समाजो के मध्य अपनी सशक्त लोकसंस्कृति, साहित्य व समाज को उस प्रतिष्ठित मुकाम तक पहुचाने मे असमर्थ हो रहे हैं, जिस मुकाम पर हमे अन्य समाजो व वर्गो के मध्य पहली पात पर खड़ा होकर उत्तराखंड के मान-सम्मान हेतु एक जुट होना चाहिए था। इससे निजात पाने के लिए हम सभी कार्यरत संस्थाओं व टुकड़ो मे बटै उत्तराखंडी समाज को एक बैनर के तले आकर काम करना होगा। आयोजित विचार गोष्ठी ‘जागिजावा’ मे वक्ताओं ने सारगर्भित विचार व्यक्त किए।

व्यक्त किया गया कि उत्तराखंड के अनेक प्रबुद्ध जनों ने रंगमंच को समझने की कोशिस की है। उत्तराखंड का रंगमंच मे उच्च स्थान है। साहित्य रचा जा रहा है। नाटकों का इतिहास स्मृद्ध रहा है। लोकनाट्य असीमित हैं, जरुरत है तो उन्हे आगे बढाने की।

वक्ताओं ने कहा उत्तराखंड के रंगमंच को सौ वर्ष पूर्ण हो गए हैं। इसे स्मृद्ध करना होगा। प्रबुद्ध स्थानीय विद्ववानों व साहित्यकारो द्वारा आलेखित कुंमाउनी, गढ़वाली व जौनसारी लोकसाहित्य का अनुवाद नही हो रहा है, जो चिंता का विषय है, इस पर ध्यान देकर इसकी स्मृद्धि व उत्थान हेतु कार्य करना होगा। व्यक्त किया गया कि समाज राजनीति से नही सरोकारों से चलता है।

प्रत्येक स्तर पर कार्य कर रहे प्रबुद्ध लोगो का विस्तृत विवरण जुटाना हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए। दिल्ली व अन्य प्रवासी बन्धुओ तथा पहाड़ के लोगो के बीच संवाद बनाना जरूरी है, जो एक जुट होकर ही किया जा सकता है। महिलाऐ व युवा वर्ग प्रबुद्ध वरिष्ठ जनों के सहयोग व आशीर्वाद से एकजुटता मे बढ़-चढ़ कर भागीदारी कर सोच को सार्थक व सफल बनाने मे महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

व्यक्त किया गया कि आलोचकों की आलोचना भी जरूरी है जो सोच का दायरा बढ़ाती है। कई वक्ताओं के विरोधाभाष, सोच का दायरा व विषय अलग-अलग जरूर थे, परन्तु सबका लक्ष्य व मकसद एक था, उत्तराखंड राज्य व उसके वर्ग व समाज की निःस्वार्थ भाव से एक जुटता से कार्यो का निष्पादन करना।

स्थानीय बोली को प्राथमिकता देने की बात पर भी अनेक वक्ताओं ने बल दिया। स्थानीय रंगमंच व फिल्मों मे तकनीकी ज्ञान को बढ़ावा देने के लिए कार्यशालाओं व प्रशिक्षण पर भी तथ्यपरख विचार रखे गए। इस बात पर बल दिया गया कि प्रशिक्षण व कार्यशाला मात्र डिग्री हासिल करने के लिए न हो बल्कि प्रशिक्षणकर्ताओ का गहन ज्ञान बढ़ाकर उसे स्मृद्ध कर धरातल पर लाकर स्मृद्धि के लिए सोच बने।

वक्ताओं ने कहा कि रचनाधर्मियों व गीतकारो मे इतनी शक्ति है कि वे सत्ता परिवर्तन की क्षमता रखते हैं। सबके साथ सम्पर्क हो, विचारों का आदान प्रदान एक जुटता के लिए हो। हमे अपनी प्राथमिकताओं को पहचान कर उन्हे अग्रसर करना होगा, उसी आधार पर अन्य समाजो के मध्य कदम रखना व बढाना होगा, तभी सफलता मिलेगी।

विरासत मे मिली संस्कृति के संयोजन की जिम्मेवारी नई पीढ़ी को उठानी होगी। जिस प्रकार हमारी मध्य हिमालय उत्तराखंड की प्रकृति की अपार सुंदरता है उसी अंदाज मे हम सबको मिल बैठ कर अपने कार्यक्रम भी सुन्दर व आकर्षणपूर्ण मंचित करने होंगे। बोली-भाषा, रहन-सहन, आचार-विचार हमारी पहचान को उजागर करते है। अपने समाज के लोगो को हम सबको प्राथमिकता देनी होगी, उनकी हर सम्भव मदद करनी होगी। इस सोच से हमारा लोकसाहित्य, संस्कृति, रंगमंच व फिल्मों को दर्शक मिलेंगे, सामाजिक उत्थान से अपार सफलता व स्मृद्धि मिलेगी। उत्तराखंड चहुमुखी विकास की ओर अग्रसर होगा।

वक्ताओं मे मंचासीन प्रबुद्ध विद्वान जनों के अतिरिक्त उत्तराखंड के अनेकों रंगकर्मियों, फिल्मकारों साहित्यकारो, पत्रकारों, सामाजिक व सांस्कृतिक संस्थाओं से जुड़े लोगो मे प्रमुख हेम पंत, चारु तिवारी, संयोगिता ध्यानी, श्रीश डोभाल, डॉ पुष्पा जोशी, चंद्रमोहन पपनैं, मनोज चंदोला, हरीश, ओ पी डिमरी, ब्रज मोहन शर्मा, जखमोला, वीरेंद्र, रंजीत भारतीय व हरि सेमवाल ने सारगर्भित व सशक्त विचार रखे।

संस्था की अध्यक्षा सुशीला रावत के सभी उपस्थित प्रबुद्ध जनों का आभार व्यक्त करने के साथ ही विचार गोष्ठी का समापन हुआ।

गोष्ठी का संचालन सुप्रसिद्ध रंगकर्मी खुशाल सिंह बिष्ट व नरेंद्र रौथाण ने उत्तराखंड की पृष्ठभूमि से जुडे महत्वपूर्ण विषयों लोककला, संस्कृति, फिल्म व सामाजिक विषयो को मध्य रख बखूबी सारगर्भित रूपरेखा बाध कर किया।

प्रबंध संपादक प्रकृतलोक
[email protected]
9871757316

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