उत्तराखण्ड की सड़कें आज भी हादसों की डगर

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देेेेेहरादून। सरकार की लाख कोशिशों के बावजूद सूबे की सर्पीली सड़कें आज भी खूनी बनी हुई है। अगर आंकड़ो के हिसाब से देखा जाए तो प्रति दिन तीन लोग प्रदेश में हर रोज असमय काल का ग्रास बन रहे है।
उत्तराखंड में सड़क हादसों को रोकने के लिए प्रदेश सरकार से लेकर पुलिस, प्रशासन और परिवहन विभाग लगातार अभियान चला रहा है। बावजूद उसके सड़क हादसों में कोई कमी नहीं देखी जा रही है। उत्तराखंड में हर दिन 3 लोगों की मौत सड़क हादसे में हो रही है। यानी की हर साल एक हजार से ज्यादा लोगों की मौत सड़क हादसे में हो रही है। बीते तीन साल में उत्तराखंड में 4,590 सड़क हादसों में 2,992 लोगों की मौत हो चुकी है।
यह आंकड़ा प्रदेश में आपराधिक घटनाओं में होने वाली हत्याओं से कई गुना ज्यादा हैं। राज्य को बने हुए 18 साल से ज्यादा का वक्त हो चुका है, लेकिन इन 18 सालों में 25 हजार से ज्यादा लोग काल के गाल में समा चुके है।
आंकड़ों में इसकी भयावह तस्वीर नजर आने के बाद भी हर हादसे के बाद सिर्फ खामोशी होती है। हद तो यह कि अधिकांश हादसों का जिम्मेदार मृतक या फिर दुर्घटना का कारण बनने वाले वाहन और उसके चालक के मत्थे मढ़ दिया जाता है। जबकि, हकीकत यह है कि अधिकतर हादसे रोड डिजाइनिंग में खामी, सड़कों पर गड्ढों के होने, खतरनाक मोड़ पर संकेतक न होने, सामान्य से तेज रफ्तार और यातायात नियमों की अनदेखी जैसे कारणों से होते हैं।

उत्तराखंड पुलिस मुख्यालय से प्राप्त आंकड़ों के अनुसार प्रदेश में सड़क हादसों की तस्वीर

साल दुर्घटनाएं मौत घायल
2019 1591 932 1736
2017 1603 932 1631
2018 1468 1047 1571

सबसे ज्याद दुर्घटना वाले जिले
जिला साल दुर्घटनाएं घायल मौत
देहरादून 2016 295 139 220
देहरादून 2017 342 143 254
देहरादून 2018 317 137 254
उधम सिंह नगर 2016 381 253 257
उधम सिंह नगर 2017 362 251 262
उधम सिंह नगर 2018 356 226 260
हरिद्वार 2016 342 212 227
हरिद्वार 2017 333 194 256
हरिद्वार 2018 345 200 306
नैनीताल 2016 215 100 180
नैनीताल 2017 226 112 117
नैनीताल 2018 119 110 170

देशभर का आंकड़ा तो और डरावने वाला है. इन बढ़ते आंकड़ों को लेकर सुप्रीम कोर्ट भी चिंता जाहिर कर चुका है और उत्तराखंड सरकार इस बारे में प्रभावी कदम उठाने के निर्देश भी दिए थे। कोर्ट के निर्देशों का पालन करते हुए उत्तराखंड के मुख्य सचिव ने सबंधित विभागों को सामंजस्य बनाकर कार्रवाई करने को कहा था, ताकि बढ़ते हादसों पर लगाम लगाई जा सके, लेकिन ये कार्रवाई मात्र सड़क सुरक्षा सप्ताह तक ही सीमित रह गई।

ट्रैफिक निदेशालय चालान वसूलने तक सीमित
सड़क हादसों पर लगाम लगाने के लिए पुलिस विभाग ने नवंबर 2017 में स्पेशल ट्रैफिक निदेशालय बनाया था। जिसकी जिम्मेदारी डीआईजी स्तर के आईपीएस अधिकारी केवल खुराना को सौंपी गई थी, लेकिन ये निदेशालय सिर्फ चालान काटने तक ही सीमित रह गया।

ट्रैफिक पुलिस ने सड़क हादसों पर लगाम लगाने के लिए वर्ष 2018 में 16 लाख 14 हजार वाहनों का चालान काटकर 23 करोड़ 52 लाख राजस्व वसूल कर अपना काम पूरा कर देने का दावा कर रहा है।

एक नजर पिछले चार साल के चालान पर
साल कुल चालान राजस्व वसूल
2015 7 लाख 18 हजार 9 करोड़ 75 लाख
2016 8 लाख 11 करोड़ 1 लाख
2017 10 लाख 42 हजार 14 करोड़ 1 लाख
2018 16 लाख 14 हजार 23 करोड़ 52 लाख

क्या कहते है पुलिस अधिकारी
उत्तराखंड में बढ़ रहे इन हादसों के बारे में जब पुलिस महानिदेशक (अपराध व कानून व्यवस्था) अशोक कुमार से बात की गई तो उन्होंने बताया कि सड़क दुर्घटनाओं की सबसे बड़ी वजह प्रदेश में जरूरत के मुताबिक सड़कों का विस्तारीकरण न होना है। इसके साथ ही खस्ताहाल सड़कें और उस पर ऊपर से बढ़ता यातायात का दबाव. हालांकि पुलिस का दावा है कि वो लगातार सड़क सप्ताह अभियान के जरिए लोगों को ट्रैफिक नियमों के प्रति जागरूक कर रहे हैं।

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