स्लीप और रेस्पिरेटरी केयर देने के लिए अपनी प्रतिबद्धता को सुदृढ़ किया

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स्लीप और रेस्पिरेटरी केयर देने के लिए अपनी प्रतिबद्धता को सुदृढ़ किया
स्लीप एवं रेस्पिरेटरी केयर उत्पादों पर ‘नो-कॉस्ट ईएमआई‘ स्कीम की घोषणा की
देहरादून। ‘स्लीप हेल्थ‘ के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को दोहराते हुए, हेल्थ टेक्नोतलॉजी में वैश्विक अग्रणी रॉयल फिलिप्सी  ने आज स्लीप एंड रेस्पिरेटरी सॉल्यूशंस की रेस्पिरॉनिक्स रेंज के तहत अपने उत्पादों पर ‘नो-कॉस्ट ईएमआई‘ ऑफर की घोषणा की। इन समाधानों से क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (सीओपीडी) और ऑब्सट्रक्टिव स्लीप एपनिया (ओएसए) से पीड़ित रोगियों को मदद मिलेगी। सीओपीडी, लंबी अवधि की सांस की समस्या वाली फेफड़ों की बीमारी है, जबकि ओएसए एक दीर्घकालिक स्थिति है जहां रोगी नींद के दौरान सांस लेने में बाधा का अनुभव करता है।
सीओपीडी के लिए, उत्पादों की श्रेणी में ऑक्सीजन कॉन्सेंट्रेटर्स और नॉन-इनवेसिव वेंटिलेटर शामिल हैं, जबकि ओएसए के लिए उत्पादों में कॉन्टीन्यूअस पॉजिटिव एयरवेज प्रेशर (सीपीएपी) डिवाइस शामिल हैं। सीओपीडी और ओएसए दोनों के ओवरलैप से पीड़ित मरीजों को यह भी पता चलेगा कि सीपीएपी डिवाइसेज दोनों बीमारियों के लक्षणों को दूर करने में मदद करेंगे। भारत में मरीज फिलिप्स के अधिकृत पार्टनर्स द्वारा संचालित आउटलेट पर जाकर या टोल फ्री नंबर-1800 258 7678 पर कॉल करके सीओपीडी और ओएसए के उत्पादों पर ‘‘नो-कॉस्ट ईएमआई‘‘ ऑफर का लाभ उठा सकते हैं। मरीज इस ऑफर का लाभ उठाने के लिए 58888 पर एसएमएस भी कर सकते हैं। फिलिप्स इंडिया में स्लीप एवं रेस्पिरेटरी केयर के प्रमुख हरीश आर ने घोषणा पर टिप्पणी करते हुए कहा, ‘‘स्लीप एवं रेस्पिरेटरी केयर में फिलिप्स रेस्पिरॉनिक्स वैश्विक अग्रणी है, जो मूल्यण आधारित समाधान प्रदान करने को लेकर काफी जोशीला है। यह समाधान रोजमर्रा की जिन्दगी में स्वस्थ रोगी और अधिक उत्पादकता प्रदान करता है। वैसे तो समाधानों के लिए कई दृष्टिकोण हैं, पर हमारा मानना है कि एक प्रमुख पहलू यह सुनिश्चित करना होगा कि लोगों के पास स्लीप एपनिया और सीओपीडी के लिए अधिक किफायती समाधान उपलब्ध हों। इससे न केवल जीवन की गुणवत्ता में वृद्धि होगी, बल्कि अर्थव्यवस्था पर सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। फिलिप्स के नवीनतम वार्षिक वैश्विक सर्वेक्षण ‘बेटर स्लीप, बेटर हेल्थ’ के अनुसार, वैश्विक स्तर पर 100 मिलियन से अधिक लोग स्लीप एपनिया से पीड़ित हैं। इन लोगों में से 80 प्रतिशत से अधिक लोग इसके बारे में जानते नहीं हैं और 30 प्रतिशत लोगों को नींद लेने और इसे बनाए रखने में मुश्किल होती है।

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