मानसून के दौरान दून के हजारों घरों पर खतरे के बादल

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देहरादून। मानसून की बरसात शुरु होने के साथ ही प्रदेश की राजधानी देहरादून के हजारों घरों पर खतरा मंडराने लगा है। हर साल बारिश का पानी नदियों के जलागम क्षेत्र में बसी बस्तियों में घुस जाता है और यहां रहने वालों का भारी नुकसान करता है। हाईकोर्ट ने पिछले साल इन नदियों के जलागम क्षेत्र में हुए इन अवैध कब्जों को हटाने का आदेश दिया था। लेकिन सरकार ने अध्यादेश लाकर तीन साल तक के लिए इसे टाल दिया। राज्य सरकार का दावा है कि इन्हें कहीं और बसाया जाएगा। उसके बाद ये बस्तियां खाली की जाएंगी लेकिन जब तक ऐसा होगा तब तक बारिश में हर साल खतरा बना रहेगा। उत्तराखंड में मॉनसून रफ्तार पकड़ने लगा है। भारी बरसात की अभी शुरुआत नहीं हुई है। लेकिन रिस्पना-बिंदाल के किनारे बसे लोग खौफ में हैं। देहरादून शहर के बीचों-बीच बहने वाली रिस्पना और बिंदाल नदियों के आस-पास बसे हजारों लोग डर के साए में जी रहे हैं। बार-बार के वादों के बावजूद न कोई सुरक्षा दीवार बनी है और न ही कोई पुश्ता। स्थानीय निवासी खौफ में हैं और कह रहे हैं कि बारिश शुरु होते ही उनके दिलों की धड़कनें बढ़ जाती हैं। हमेशा डर लगा रहता है कि न जान पानी कब, क्या तबाही मचा दे। मगर निगम दावा कर रहा है कि इस बार बारिश से आने वाली मुसीबतों से निपटने के पुख्ता इंतजाम हैं। मेयर सुनील उनियाल गामा का दावा है कि इस साल सभी बड़े नालों और नदियों से टनों कूड़ा उठाया गया है ताकि उनका प्राकृतिक प्रवाह बना रहे। मॉनसून का समय तय है लेकिन रिस्पना और बिंदाल नदियों पर काम कब शुरु होगा और कब इन लोगों को यहां से हटाकर कहीं और बसाया जाएगा। इसका कोई समय तय नहीं है। इसका नतीजा यह होता है कि हर बारिश में दोनों नदियों के किनारे बसे लोग घरों के अंदर कम और बाहर ज्यादा नजर आते हैं। राजनीतिक पर्यवेक्षक राज्य भर में बसी ऐसी अवैध बस्तियों को वोटों की खेती कहते हैं। नेताओं को इन लोगों की याद तब आती है जब कोई चुनाव नजदीक होता है। बाकी समय अपनी सारी समस्याओं को ये लोग खुद ही झेलते हैं।

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