कौन करेगा इस पत्रकार की मदद  दर दर की ठोकरें खाता पत्रकार

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देहरादून। पत्रकारों की दुर्घटना में असामयिक मृत्यु एवं गंभीर बीमारी के इलाज के लिए मदद व परिवार की आर्थिक सहायता हेतु समय पर सहायता राशि मिले इस उद्देश्य से पत्रकार कल्याण कोष की स्थापना की गई थी। जिससे पत्रकार व उनके परिवार को तत्काल सहायता राशि उपलब्ध करवाई जा सके। लेकिन उतराखंड में विगत दो वर्षों से कल्याण कोष समति की बैठक ही नही हुई।
जिस कारण दर्जनों पत्रकारों की पत्रकार कल्याण कोष की फाइलें सूचना विभाग की अलमारियों में कैद है। जिस उद्देश्य से इस कोष को बनाया गया वह आज उद्देश्य से भटकता नजर आ रहा है। राज्य में दर्जनों पत्रकार जो या तो बीमार है, या सड़क दुर्घटना में चोटिल होने की वजह से कार्य करने में असमर्थ है। जिनके परिवार आज आर्थिक संकट से जूझ रहे है।

बताते चलें कि तीन सालों से अस्वस्थ चल रहे पत्रकार सुभाष त्यागी कहते है कि, परिवार में पत्नी, तीन बेटियां 70 साल की बूढ़ी मां है। सिवाए उनके और कोई भी कमाने वाला घर में नही है।घर की स्थिति दिनों-दिन बिगड़ती जा रही है, और जब उन्होंने पत्रकार कल्याण कोष में एक फाइल लगाई उस पर भी आज तक एक फूटी कौड़ी नसीब नही हुई।

सरकार कहती है कि, कई योजनाएं बनी है। लेकिन हकीकत यह है कि, योजनाओ में काम नही हो रहा है। पत्रकार कल्याण कोष की दो सालों से एक भी बैठक नही हुई। जबकि इस समिति के अध्यक्ष स्वयं सीएम है। हजारो करोड़ के कर्ज के बोझ तले दबे उतराखंड में सेटिंग अच्छी हो तो कुछ भी हो सकता है। यह हम नही खुद यहाँ की सरकार और उसके अफसरों की कार्यशैली बताती है।

सरकारी सिस्टम का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि, उत्तराखंड एक अस्वस्थ पत्रकार को बारह हजार व दिल्ली लखनऊ के सेटिंगबाजो को उन्नीस लाख, दस लाख का विषेषांक विज्ञापन सरकार द्वारा जारी किया गया। आरटीआई से मिली जानकारी के बाद राज्य में पंद्रह वर्षों से पत्रकारिता कर रहे एक सफ्ताहिक समाचार पत्र के स्वामी, प्रकाशक, राज्य के मान्यता प्राप्त पत्रकार, सुभाष त्यागी कहते है कि, मेरी सेटिंग नही थी। इसलिए बीमार होने का पता होने के बाबजूद मुझे नियम कानून का पाठ पढ़ाया गया। लेकिन आरटीआई में जो दस्ताबेज मिले है, वह चौकाने वाले तो है ही साथ ही मन दुखी भी करते है।

दरसल पत्रकार सुभाष त्यागी तीन साल पहले अचानक बीमार हो गए एक हाथ, पांव ने काम करना बंद कर दिया। आवाज भी बड़ी मुश्किलों में निकली। कर्ज लेकर इलाज करवाया लेकिन फिर कुछ ही माह बाद दुबारा अटैक पड़ गया। परिवार में कोई आर्थिकी का जरिया न होने के कारण सर पर इलाज के लिए लिया गया लाखो का कर्ज और परिवार को पालने की चिंता एक पत्रकार के लिए इससे बड़ा दुःख क्या हो सकता। त्यागी ने बताया जब वह थोड़ा सा चलने फिरने लायक हुए तो पहले सूचना विभाग में पत्रकार होने के नाते पत्रकार कल्याण कोष में एक आवेदन किया।लेकिन फाइल भी छह माह से सूचना विभाग की अलमारियों में जंक खा रही है।
सूचना महानिदेशक से अपनी कथा-व्यथा सुनाई, अपने समाचार पत्र चूड़ामणि संदेश को विषेषांक ही दिए जाने की मांग की, उनके द्वारा अस्वाशन दिया गया, लेकिन जब विज्ञापन मिला तो भीख के जैसे। अब दुखी मन से कहना पड़ रहा है कि, मेरा दुर्भाग्य ही है कि, मेरा जन्म उतराखंड में हुआ। यहाँ पर जरूरत मंदो की नहीं, सेटिग बाजों की चलती है। सुभाष त्यागी ने बताया कि, राज्य के पत्रकारों के साथ भेदभाव किया जा रहा है। मेरे विशेषांक विज्ञापन के आवेदन पर बारह हजार छ सौ (12,600) का विज्ञापन और दिल्ली, लखनऊ, कर्नाटक की मैगजीनों को लाखों का विज्ञापन दिया गया।

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