सनद रहे कि हिमालय संसाधन नहीं है .

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सनद रहे कि हिमालय संसाधन नहीं है ..

योगेश भट्ट

पता नहीं यह कितना सच है कि हमारे हिमालयी राज्य सालाना तकरीबन 94 हजार 500 करोड़ मूल्य की पर्यावरणीय सेवायें दे रहे हैं । पिछले काफी समय से लगातार यह सुनने पढ़ने में आ रहा है कि हिमालयी राज्यों के जंगल इतनी रकम का कार्बन उत्सर्जन करते हैं, मतलब पर्यावरण में कार्बन के प्रभाव को कम करते है । इसी आंकड़े को आधार बनाकर हिमालयी राज्य केंद्र से ग्रीन बोनस की मांग भी कर रहे हैं या यूं कहें कि हिमालय राज्यों की सरकारें पर्यावरण व पारिस्थतिकी सरंक्षण के एवज में ईनाम मांग रहे हैं । हालांकि ईनाम के तौर पर रायल्टी या बोनस की यह मांग कोई नयी नहीं है ।

हिमालयी राज्यों की सरकारों के अपने स्तर पर पर्यावरणीय सेवा के एवज में रायल्टी की मांग अलग अलग तो पहले भी होती रही हैं, मगर अब इस मुद्दे पर सभी हिमालयी राज्य एकजुट हो रहे है । हिमालय राज्यों के एक संयुक्त एजेंडे की बात भी हो रही है । यह खबरें कुछ सुकून देने वाली तो हैं, लेकिन सरकारें हिमालय के सरोकारों पर खरी उतरेंगी इस पर सवाल ही नहीं संशय भी है । कारण यह है कि हिमालयी पर्यावरण, उसकी जैव विविधता और वहां निवास कर रहे समाज के मुद्दे पर खुद राज्य सरकारों का रवैया दोगला है । हिमालय के तमाम ठेकेदार और खुद सरकारें हिमालय को मात्र एक संसाधन मान बैठे हैं । राज्यों में एक ओर पर्यावरणीय सेवाओं और जैव विविधता के एवज में ग्रीन बोनस की मांग की जाती है और दूसरी ओर विकास और अवस्थापना विकास के नाम पर ऐसी योजनाएं थोप दी जाती है जो संवेदनशील पारिस्थतिक तंत्र को चोट पहुंचाती हैं ।

मकसद अगर सिर्फ ईनाम झटकने है तो बात अलग है, वरना एक स्वाभाविक सवाल यह है कि पर्यावरण सेवा के एवज में ईनाम चाहने वाली राज्य सरकारों का पर्यावरण और जैव विविधता संरक्षण में आखिर क्या योगदान है ? निष्पक्ष आंकलन हो जाए तो उल्टा राज्य सरकारें पर्यावर
ण और जैव विविधता को बिगाड़ने की जिम्मेदार अधिक पायी जाएंगी। चिंताजनक पहलू यह है कि सरकारें और चंद ठेकेदार हिमालय के सरोकारों को असल मुद्दों से भटकाकर सिर्फ ग्रीन बोनस और अलग फंडिंग पैटर्न तक सिमेटने की कोशिश में जुटे है । आज जब हिमालयी राज्य एक साथ चर्चा करने लगे हैं तो जरूरत इस बात की है कि एक संयुक्त एजेंडा तय हो, मगर हिमालय को सिर्फ एक संसाधन मात्र समझकर कतई नहीं ।

दरअसल हिमालय को समझने और सहेजने में हर स्तर पर चूक होती रही है । और यह चूक आज या पिछले कुछ सालों से नहीं बल्कि सालों साल से होती आयी है । जिस हिमालय को बड़ी संवेदनशीलता के साथ सहेजा जाना चाहिए था, उसे बेरहमी से रौंदा गया है । जितनी उपेक्षा हिमालय की आजादी के बाद से हुई, उतनी संभवत: अंग्रेजी शासन में भी नहीं हुई । योजना आयोग के एक विशेषज्ञ दल ने तो व्यापक अध्ययन के बाद 1992 में हिमालय के एक लिए एक अलग प्राधिकरण गठित किये जाने की जरूरत बतायी, मगर उस पर अमल आज तक नहीं किया गया। आज हालात यह हैं कि उत्तराखंड से लेकर अरुणाचल तक तकरीबन एक हजार से अधिक बांध हिमालय क्षेत्रों में बन रहे हैं। पर्यटन और उद्योग के नाम पर अनियोजित विकास हो रहा है।

यह किसी एक राज्य की समस्या नहीं है हालात हर जगह कमोवेश एक जैसे हैं ।जहां तक हिमालय का सवाल है तो उसके दो पहलू हैं, एक पहलू पर्वत, हिमनद, नदियों, वन, वनस्पतियां और वन्य जीव है तो दूसरा उसकी गोद में निवास करने वाला समाज । दोनो एक दूसरे के पूरक हैं, लेकिन दुर्भाग्य यह है कि सरकारों ने हमेशा इन्हें अलग अलग करके देखा है । सरकारों का रवैया हिमालय और हिमालय में बसे समाज के प्रति मनमाना रहा है । जब चाहा उन्हें संसाधन समझकर रौंदा, जब चाहा कानून का डंडा खड़ा कर कोई भी प्रतिबंध ठोक दिया ।

अब उत्तराखंड को ही देखिए, जिन जंगलों के एवज में यहां ग्रीन बोनस मांगा जा रहा है, वहां आल वेदर रोड़ और उस जैसी दूसरी अव्यवहारिक परियोजनाओं के नाम पर हजारों की संख्या में पेड़ काटे जा चुके हैं ।
आश्चर्य यह है कि एक ओर हजारों करोड़ ग्रीन बोनस की मांग की जाती है और दूसरी ओर राज्य को केंद्र से वन भूमि हस्तांतरण के एवज में मिलने वाले तकरीबन 900 करोड़ रुपए माफ कर दिये जाते हैं । आल वेदर रोड़ का मलवा नदियों में खुलेआम धकेला जा रहा है, एक तरह पुश्ते बन रहे हैं दूसरी ओर से ढह रहे हैं ।

कहने को वन अधिनियम के चलते वन और वन भूमि के साथ छेड़छाड़
नहीं हो सकती, मगर पहाड़ों पर जिधर देखिये उधर ही कंक्रीट के जंगल पसरते जा रहे हैं । पर्यटन को बढ़ावा देने के नाम पर संवेदनशील बुग्यालों को मैरिज डेस्टिनेशन के तौर पर प्रचारित किया जा रहा है । निर्माण कार्यों में बड़ी मशीनों और विस्फोटकों का इस्तेमाल हो रहा है । पंचेश्वर बांध जैसे बड़ी परियोजना को यहां बड़ी आसानी से मंजूरी दे दी जाती है ।

सच यह है कि हिमालय का दोहन हुआ है और हिमालयी समाज की उपेक्षा हुई है । इसी का नतीजा है कि पूरे हिमालय क्षेत्र में प्राकृतिक जलस्त्रोत सूख रहे हैं, जंगल धीरे धीरे घट रहे हैं, मौसम चक्र में निरंतर बदलाव हो रहा है। तमाम वनस्पतियां विलुप्त होने के कगार पर हैं। परिस्थितिकी में तेजी से परिवर्तन हो रहा है । भूस्खलन और बाढ़ की घटनाओं में भी इजाफा हो रहा है । पूरे हिमालय की जैव विविधता खतरे में पड़ी है । सिर्फ प्रकृति ही नहीं बल्कि समाज भी बुरी तरह प्रभावित हो रहा है। हिमालय के उद्धार के लिए योजनाएं तो बन रही है, सालाना करोड रुपया भी खर्च हो रहा है मगर नतीजा सिफर ।

दो साल पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पहल राष्ट्रीय हिमालय मिशन भी शुरू हुआ तो उस वक्त भी नयी उम्मीद जगी । इस मिशन में वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन, कौशल विकास, प्लानिंग, कृषि, डवलपमेंट फार नार्थ ईस्ट रीजन, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी और जल संसाधन मंत्रालयों को शामिल किया गया । मिशन की नोडल ऐजेंसी जीबी पंत नेशनल इंस्टिट्यूट आफ हिमालयन इन्वायरमेंट डवलपमेंट को बनाया गया । इस संस्थान ने 42 परियोजनाओं को अंतिम रूप दिया जिसमें जड़ी बूटियों, गलेश्यिरों और नदियों के संरक्षण के साथ ही हिमालयी विवधताओं का डाटा बेस तैयार करने, हिमालय क्षेत्र में रहने वालों की आजीविका में सुधार और मानव वन्य जीव संघर्ष के निराकरण संबधी परियोजनाएं शामिल थीं । अंतत: उनका क्या हुआ , कुछ नहीं पता।

इसी तरह उत्तराखंड समेत कुछ अन्य हिमालयी राज्यों में सुरक्षित हिमालय परियोजना भी मंजूर की गयी । हिमालय की पारिस्थतिकी की निरंतरता के लिए भी एक राष्ट्रीय मिशन बनाया गया । फिर भी हिमालय और हिमालय में निवास करने वाले समाज समस्याएं जस की तस है । हकीकत यह है कि हिमालय को लेकर योजनाएं बनी जरूर लेकिन उन पर अमल ईमानदारी और संवेदनशीलता के साथ कभी हुआ ही नहीं । हिमालय में विकास और पारिस्थतिकी बीच संतुलन बनाने की कोशिश ही नहीं हुई न ही कभी इसके लिए गंभीर विमर्श किया गया ।

इतिहास साक्षी है हिमालय को बचाने की आवाज पचास के दशक से उठ रही है । महान समाजवादी चिंतक डा राम मनोहर लोहिया ने सबसे पहले हिमालय बचाओ का नारा दिया, तब उनका कहना था हिमालय बचेगा तो देश बचेगा । वह तो हिमालय बचाने के लिए विदेश नीति को मजबूत करने पर जोर देते थे। लोहिया के जमाने से अब तक हिमालय को बचाने के नाम पर न जाने कितने सरकारी गैरसरकारी अभियान चले, मगर हिमालय के हालात बद से बदतर ही हुए हैं ।

यह इस बात का भी प्रमाण है कि आजादी के बाद से अब तक हिमालय की किस कदर अनदेखी हुई । समस्या यही है कि हिमालय को हमेशा देश के एक किनारे पर रखकर सिर्फ सतही तौर पर सोचा गया । जबकि यह हमारे या अन्य एक-दो देशों का नहीं बल्कि पूरे एशिया का विषय है, आखिर यूं ही तो हिमालय को एशिया का वाटर टावर नहीं कहा जाता । जहां तक भारत का सवाल है तो हिमालय उसके लिये किसी वरदान से कम नहीं है । देश के कुल क्षेत्रफल का 16 प्रतिशत से अधिक क्षेत्र ग्यारह हिमालयी राज्यों में फैला हुआ है। आठ करोड़ से अधिक आबादी सिर्फ इसकी गोद में निवास करती है ।

यहां से निकलने वाली गंगा, सिंधु और ब्रहमपुत्र देश को 60 प्रतिशत पानी की आपूर्ति करती है। यहां से निकलने वाली 12 नदियों से साल भर में लगभग 1275 अरब घन मीटर पानी बहता है। शुद्ध ऑक्सीजन ओर जड़ी बूटियों का भी भंडार है यह । इसकी अपनी कुल जनसंख्या भले ही आठ करोड़ के लगभग हो मगर देश के करोड़ों लोगों का अस्तित्व इससे जुड़ा हुआ है । हिमालय की अहमियत का अंदाजा इससे भी लगाया जा सकता है कि स्वस्थ पर्यावरण मानक के अनुसार कुल क्षेत्रफल का 33 फीसदी जंगल होना चाहिए और देश में मात्र 22 फीसदी भूभाग पर ही जंगल है । यह भी तब है जब ग्यारह हिमालयी राज्यों के कुल भूभाग के 45 फीसदी पर जंगल है ।

थोड हटकर सामरिक लिहाज से देखें तो अफगानिस्तान, पकिस्तान, भूटान, नेपाल, प्यांमार देश की सीमाओं से लगा होने के कारण हिमालय भारत के लिए रक्षक की भूमिका में भी है। सिक्किम के पूर्व सांसद पी डी राय के अनुसार तो हिमालय की भू-राजनीतिक महत्ता भी कुछ कम नहीं है । पश्चिम से पूर्व तक पाकिस्तान, नेपाल, चीन, भूटान, म्यांमार और बांग्लादेश की अंतरराष्ट्रीय सीमाएं हिमालय से लगी हैं । इसलिए सामरिक और व्यापारिक, दोनों ही लिहाज से इसकी अलग अहमियत है.।

इन देशों के साथ व्यापारिक रिश्ते बढ़ाने के लिए अगर थोड़ी सूझबूझ दिखाई जाए तो व्यापार के विकास की अनगिनत राहें खुल सकती हैं । साल 2004 में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और चीनी प्रधानमंत्री के बीच हुए एक समझौते के तहत 44 साल के बाद 2006 में नाथू-ला दर्रे को व्यापार के लिए खोले जाने का वह कई मौको पर उल्लेख कर चुके हैं। उनके अनुसार केवल सीमावर्ती इलाके के बीच सिमटा यह व्यापार, व्यापक हो जाए तो सिक्किम की अर्थव्यवस्था में जबरदस्त उछाल आएगा ।

भारत में उत्तराखंड, हिमाचल, जम्मू कश्मीर, नागालैँड, मणिपुर, सिक्किम, अरुणांचल, मिरोजम, त्रिपुरा, आसाम ओर मेघालय राज्य प्रमुख हिमालयी राज्यों में है। कश्मीर से अरुणाचल प्रदेश तक तकरीबन 2500 किलोमीटर तक फैले इन हिमालय राज्यों की एक विडंबना और है । वह यह कि, यहां निवास करने वालों की सुध सिर्फ तभी ली जाती है जब आपदाएं आती हैं । हिमालय को लेकर चिंता भी तभी ज्यादा की जाती है जब केदारनाथ में जल प्रलय, जम्मू में बाढ़, हिमाचल में भू स्खलन और सिक्किम में भूकंप जैसी आपदाएं आती हैं ।

राज्यों के पास कोई ऐसे संवैधानिक अधिकार नहीं हैं जो कोई नीति विशेष तैयार कर सकें। ससंद में हिमालयी राज्यों के कुल सांसदों की संख्या चालीस से ऊपर है, फिर भी उनकी कोई सुनवाई नहीं है । कमी सांसदों की ओर से भी रही है, हिमालयी राज्यों के सांसदों ने एकजुट होकर संसद में हिमालय का मुददा उठाया ही नहीं । हां पिछली लोकसभा में उत्तराखंड से सांसद रमेश पोखरियाल निशंक ने सदन में हिमालय के लिए एक स्वतंत्र मंत्रालय का गठन करने का प्रस्ताव जरूर रखा ।

बहरहाल आधिकारिक शोध संस्थाएं लगातार हिमालय पर बढ़ते खतरे को लेकर आगाह कर रही हैं । ऐसे में उत्तराखंड में हिमालयी राज्यों की सरकारें विशेषज्ञों और नीति आयोग की मौजूदगी में हिमालयी मुद्दों पर चर्चा करेंगी । चर्चाएं पहले भी बहुत हुई है मगर इस आयोजन से हिमालय के भविष्य को लेकर बड़ी उम्मीदें हैं । मेजबान उत्तराखंड हालांकि खुद हिमालय से जुडे तमाम मुद्दों पर कटघरे में है, मसलन बीस साल होने जा रहे हैं एक हिमालय राज्य होने के बावजूद अभी तक उसकी स्थायी राजधानी नहीं है ।

मसूरी, जहां यह आयोजन होने जा रहा है, वहां के ढलानों पर फैले कंक्रीट के जंगल, पर्यटक नगर होने के बावजूद वहां की परिवहन और कचरा प्रबंधन की व्यवस्था सही नहीं है । इसके अलावा पहाड़ के गावों को नगरों की सीमा में लाने के फैसले और राज्य में भूमि की बेरोकटोक अनियंत्रित खरीद फरोख्त के लिए भू कानून में संशोधन करने, शराब फैक्ट्रियों और भांग की खेती को बढ़ावा देने के फैसलों पर भी सवाल उठ रहे हैं। फिर भी तमाम संशय और सवालों के बीच उम्मीद की जाती है कि हिमालयी राज्यों की चर्चा सिर्फ ग्रीन बोनस की मांग और केंद्रीय योजनाओं में अलग से बजट तक सीमित नहीं रहेगी ।

ध्यान रहे हिमालय नीतिगत मुद्दा है और सवाल उसके प्रति संवेदनशीलता और हिमालयी समाज के अधिकारों का भी है । मौजूदा नीतियां हिमालय के मिजाज से कतई मेल नहीं खातीं, उनके भरोसे हिमालय के विकास की कल्पना भी नहीं की जा सकती । इसलिए बात ग्रीन बोनस से आगे विकास के उस माडल पर भी होनी चाहिए जिसमें जन सहभागिता अनिवार्य तौर पर सुनिश्चित हो सके ।

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