मौतों का इंतजार
जान हथेली पर रख नदी पार करते बड़ियार घाटी के लोग

चंद्र प्रकाश बुड़ाकोटी
कहने को तो उत्तराखंड राज्य पहाड़ो में बसता है लेकिन दुर्भाग्य इस बात का 18 साल बाद भी यहां के अधिकांश पहाड़वासी मूलभूत सुबिधाओ को तरस रहे है।बाबजूद यहां बिराजमान रही हर सरकार ने अपने वोट बैंक के खातिर झूठे वादों के पिटारे भरे। बड़ियार घाटी के इन आठ गांवो की दुर्दशा को देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है कि विकास किस गति से चल रहा है।
भले ही उत्तराखंड में सरकार नागरिको को मूलभूत सुविधाएं पहुँचाने के लाख दावे कर ले लेकिन जमीनी हक़ीक़र दावो से उलट है।आजादी के सत्तर साल बाद भी जब तीन हजार की आबादी को पुल न होने के कारण जानजोखिम में डाल कर सफर करना पड़े और सिस्टम व सरकार के आंख कान बंद कर दे तो क्या कहेंगे। उत्तरकाशी जिले के आठ गांवो के लोग आज भी सुबिधाओं के लिए तरस गए है। अपनी विभिन्न रोजमर्रा की जरूरतें तथा शिक्षा स्वास्थ्य एवं अन्य कामकाज करने सरनोल पर निर्भर हैं। लेकिन बड़ियार घाटी के बीच आजादी के बाद से लेकर अब तक न इन गांवों को सड़क मार्ग से जोड़ा गया और न ही सरताल गंगा पर पुल ही बन सका । जिससे पुराने जमाने की भांति आज भी डिजिटल इंडिया के दौर में लोग नदी पार करके ही सरनोल आ पाते हैं। सरताल गंगा में पानी अधिक होने से पैदल नदी पार करने पर जान का जोखिम बना रहता है। गौरतलब है कि पुरोला तहशील के डिगारी,सर,लेबताड़ी,कासलो, पौंटी, गोल,छनिया, किमडार,ग्रामों के लोगो को तहसील पुरोला उत्तरकाशी जाने के लिए पांच से सात किलोमीटर दूर सड़क तक नदी पार कर पैदल आना पड़ता है। स्थानीय युवक जसवीर बताते है कि कईबार नदी पार करते समय हादसे भी हो गए है। ये आठ गावो के लोग शासन-प्रशासन, क्षेत्रीय विधायक से लेकर मंत्री मुख्यमंत्री से लगातार मांग करते आ रहे है। की सरताल गंगा में पुल बनाया जाय क्योंकि यहां से अनेकों लोगों का आना होता है।पुल बन जाने से आवागमन में काफी सुविधाएं होंगी।लेकिन इनकी सुध लेने वाला कोई नही।

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