उत्तराखंड में किसानों की आय दोगुनी होने पर संशय

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देहरादून। उत्तराखंड सरकार पीएम मोदी के सपनों को पलीता लगाने का काम कर रही है। पीएम मोदी ने देशभर के किसानों के लिए जो सपना देखा वो उत्तराखंड में टूटता नजर आ रहा है। दरअसल, उत्तराखंड में किसानों की आय दोगुनी करने के लिए राज्य में चकबंदी जरूरी है। जिसपर अधिनियम बनने के बाद भी काम नहीं हो पा रहा है। उत्तराखंड में पहाड़ों के सीढ़ीनुमा खेत फसलों के लिए अभिशाप बने हुए हैं। शायद यही वजह है कि सूबे में खेती के लिए चकबंदी को जरूरी माना गया है। इसी फार्मूले पर पिछली सरकार ने कदम आगे बढ़ाया और चकबंदी विधेयक को विधानसभा में पास कर कानून भी बना दिया, लेकिन साल 2016 में चकबंदी अधिनियम बनने के बाद इस पर अमल नहीं किया गया। चकबंदी को लेकर कानून बनने के बाद भी अब तक न तो इसके लिए अलग विभाग का कोई खाका तैयार किया गया है और न ही पदों में भर्ती को लेकर कोई काम हुआ है। साफ है कि चकबंदी पर त्रिवेंद्र सरकार एक कदम भी आगे नहीं बढ़ पाई है। इसका सीधा कारण चकबंदी में स्थानीय लोगों की नाराजगी का डर है। जिसके कारण सरकार इस कानून को मूर्त रूप नहीं दे पा रही है। उधर, केंद्र सरकार 2022 तक किसानों की आय दोगुना करने की बात कर रही है। जबकि, चकबंदी के बिना यह संभव नहीं दिखाई दे रहा है। राज्य सरकार स्वैच्छिक चकबंदी की बात कर रही है लेकिन इसके लिए भी लोगों को जागरूक करने का काम ठप पड़ा है। साल 2016 में ही चकबंदी सलाहकार समिति को ही करीब 57 से 58 गांव ने स्वैच्छिक चकबंदी की इच्छा प्रस्ताव के जरिए जाहिर की थी। बावजूद इसके आज तक एक भी गांव को चकबंदी के तहत कानूनी रूप नहीं दिया गया है। हैरानी की बात यह है कि उत्तराखंड के कृषि मंत्री सुबोध उनियाल पहाड़ों चकबंदी में बड़ी समस्या बता रहे हैं। सवाल यह है कि स्वैच्छिक चकबंदी की इच्छा जाहिर करने वाले गांव को अब तक क्यों चकबंदी में कानूनी रूप नहीं दिया गया है। क्या चंद लोगों पर जिम्मेदारी छोड़कर सरकार अपना पल्ला झाड़ सकती है। सवाल ये भी है कि बिना चकबंदी के सरकार कैसे किसानों की आय दोगना करने का दावा कर रही है।

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