त्रिवेंद्र राज में आंदोलन को मजबूर जनता,अब भोजन माताएं भी सड़कों पर- नवीन

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त्रिवेंद्र राज में आंदोलन को मजबूर जनता,अब भोजन माताएं भी सड़कों पर- नवीन

सूबे की त्रिवेंद्र सरकार को जनता का प्रचंड बहुमत मिलने के बाद भी आज लगभग चार साल बीतने को है लेकिन जनता की उम्मीदों पर ये सरकार खरा नहीं उतर पा रही है। आज राजधानी देहरादून की सड़कों ,निदेशालयों पर अलग अलग ,संगठन से जुड़े कई लोग है जो अपनी मांगो को लेकर कई दिनों से धरने पर बैठे हैं और सरकार कुंभकर्णी नींद में सोई है। आप प्रवक्ता नवीन ने एक बयान जारी करते हुए कहा,प्रदेश में पहले ही कई संघठन सड़कों पर अपनी मांगो को लेकर बैठे है अब भोजन माताओं को भी विषम परिस्थिति में काम करने के बाद धरने को मजबूर होना पड़ रहा। आज प्रदेश में उनको मिलने वाले दो हज़ार मानदेय ,जो कि उनके साथ बहुत बड़ा मज़ाक सरकारों की नीतियों के चलते किया गया,उसको लेकर वो आंदोलन की तैयारी में हैं। मिड डे मील योजना से सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले नौनिहालों का पेट भरने वाली भोजन माताएं अपनी कई मांगो को लेकर पहले भी ज्ञापन दे चुकी लेकिन समय बीत रहा और इनकी मांगे भी समय के साथ शासन की फाइलों में दब रही है। आप प्रवक्ता ने कहा ,इनकी मांगे साधारण मांगे है जिसको चाहे तो सरकार मान सकती है ,मानदेय सहित स्कूलों में गैस कनेक्शन , ड्रेस जैसे मुद्दों के लिए आंदोलन पर उतरने की तैयारी कर रही भोजन माताओं को देखना इस राज्य के लिए बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। आप सरकार से मांग करती है इनकी मांगो पर जल्द से जल्द गौर करें और इनको इनका हक़ दें ।

प्रगतिशील भोजन माता संगठन के बैनर तले यह भोजन माताएं काशीपुर और हरिद्वार में 8 सूत्रीय मांगों को लेकर ज्ञापन सौंप चुकी हैं। बोनस, ड्रेस और मानदेय वृद्धि इनकी प्रमुख मांगे हैं। जिस भोजन माता के भरोसे कई गरीब बच्चों का पेट भरता है आज वही भोजन माता अपना और अपने परिवार के भरण-पोषण के लिए महज 2000 मानदेय सरकार से पा रही जिसको लेकर वो,अब आंदोलन करने को मजबूर हैं। उत्तराखंड सरकार ने न्यूनतम 8500 मासिक मजदूरी तय की है लेकिन भोजन माताओं को ₹2000 दीया जाना उनके साथ एक बहुत भद्दा मजाक है। सरकार संवेदनहीन हो चुकी है जिसे गरीब भोजन माताओं का दर्द नजर नहीं आ रहा है। इनके मानदेय को बढ़ाने का प्रस्ताव सरकार के पास भेजा गया था लेकिन फिर भी कोई समाधान नहीं हुआ। आप पार्टी सरकार से यह पूछना चाहती है की विषम परिस्थितियों में काम करने वाली भोजन माताएं क्या ₹2000 में अपना खर्चा बहन कर सकती हैं, क्या यह भोजन माताओं का शोषण नहीं है। सरकार कई योजनाओं के लिए करोड़ों रुपए का बजट की घोषणा के साथ-साथ अवमुक्त भी कर रही है लेकिन इस प्रदेश में गरीब का खून चूसा जा रहा है। गरीब लोग सिर्फ वोट बैंक बनकर रह गए हैं । आप सरकार से मांग करती है कि जल्द से जल्द, इन भोजन माताओं का मानदेय बढ़ाया जाय ताकि इनको आंदोलन के लिए सड़कों पर नहीं उतरना पड़े ।