डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोल
भारत एक ऐसा देश है जहाँ हर दिन कोई न कोई त्यौहार मनाया जाता हैए और हर त्यौहार की अपनी एक विशिष्टता होती हैए भारत का उत्तराखंड राज्य भी एक ऐसा प्रदेश है जहाँ अनेक त्यौहार मनाये जाते हैए जिनका अपना एक अलग ही महत्व है।विश्व में उत्तराखंड का पहाड़ एक ऐसा स्थान है जहां की संस्कृति और सभयता पूरे विश्व में अलग है। यहां चैत्र मास में बच्चों द्वारा मनाया जाने वाला एकमात्र त्यौहार है फूलदेई त्यौहार जो कहीं नहीं मनाया जाता है। उत्तराखंड में जितने भी त्योहार मनाए जाते हैं उसमें यहां की पारंपरिक छवि एवं विशिष्टता देखने को मिलती है। जो एक अलग तरह का आकर्षण का केंद्र है।उत्तराखंड की धरती पर ऋतुओं के अनुसार पर्व मनाए जाते हैं। यह पर्व जहां हमारी संस्कृति को उजागर करते हैंए वहीं पहाड़ की परंपराओं को भी कायम रखे हुए हैं। इन्हीं खास पार्वो में शामिल फुलदेई पर्व पहाड़ों में गुरुवार को मनाया जाएगा।इस त्योहार को फूल संक्रंाति भी कहते हैंए इसका सीधा संबंध प्रकृति से है। इस समय चारों ओर छाई हरियाली और नाना प्रकार के खिले फूल प्रकृति के यौवन में चार चांद लगाते हैं। हिंदू परंपरा में चैत्र माह से ही नव वर्ष होता है। इस नव वर्ष के स्वागत के लिए खेतों में सरसों खिली है तो पेड़ों में फूल भी आने लगे हैं। चैत्र माह के प्रथम दिन बच्चे लोगों के घरों में जाकर दहलीज पर फूल चढ़ाते हैं और सुख.शांति की कामना करते हैं। इसके एवज में उन्हें परिवार के लोग गुड़ए चावल व पैसे देते हैं। पहाड़ों में गुरुवार को फूलदेई पर्व मनाया जाएगा। मेष संक्रांति कुमाऊं में फूल संक्रांति के नाम से भी जानी जाती है। फूलदेई की परंपरा को मनाने के लिए माह के प्रथम दिन से एक दिन पूर्व ही फूल चुनकर लाया जाता हैं और माह के प्रथम दिन बच्चे इसे टोकरी व थाली में लेकर घर.घर पहुंचते हैं। मान्यता है कि साल के प्रथम दिन ही लोगों को बच्चों के मुंह से आशीर्वाद मिले। इस दिन लोगों के घरों से मिले चावल से सायंकाल हलवा भी बनाया जाता है। पर्व के मौके पर बच्चे फूल देई.छम्मा देईए दैणी द्वारए भर भकारण्ण्गीत भी खाते हैं। इस गीत को शुभकामनाओं के रूप में गाया जाता है।देखा जाए तो फूल संक्रान्ति बच्चों को प्रकृति प्रेम और सामाजिक चिंतन की शिक्षा बचपन से ही देने का एक आध्यात्मिक पर्व हैण् इस दिन का बच्चे बड़ी बेसब्री से इंतजार करते हैण्सुबह होती ही बच्चे बुराँसए फ्योंलीए सरसोंए कठफ्योंलीए आड़ूए खुबानीए भिटौरए गुलाब आदि के फूलों को तोड़ने अपने घरों से निकल जाते हैण् इसके बाद वह इउन फूलों को घर लाकर ष्रिंगालष् से बनी अपनी टोकरी में सजाते हैंण् वैसे फुलदेई पर्व को मानने की कई कहानियां प्रसिद्ध है ए जिसनमे एक भागवन शिव से जुड़ी हुई है । जिसमें बताया गया कि भगवान शिव अपनी तपस्या में लीन थे ऋतुपरिवर्तन के कई वर्ष बीतने के बाद भी भगवान शिव साधना में विलीन थे माता पार्वती और नंदी शिवगण के कई प्रयास करने के बावजूद उनकी तंद्रा नहीं टूटी। आखिर में माता पार्वती ने एक उपाए निकाला। उन्होंने शिवगणों को फ्योली फूल खिलाकर सभी शिवगणों को पितांबरी जामा पहनाकर उन्हें बच्चों का रूप दे दिया। फिर सभी से कहा कि देवलोक की क्यारियों से वह ऐसे फूलों को लाएं जिनकी खुशबू पूरे कैलाश में महके। सबने उनकी बात मानी और देव लोक से खुशबूदार फूल लेकर आये। जिसके बाद सभी फूल उनके पास रखे गए और एक सुर में आदिदेव महादेव से उनकी तपस्या पर बाधा डालने पर क्षमा मांगी और कहा फूलदेई क्षमा देईएभर भांकर तेरे द्वार आये महाराज! शिव की तंद्रा टूटी और अपने पास बच्चों को देखकर उनका गुस्सा शांत हुआ। यह देखर शिव लोक में सभी शिव गण खुश हुए और तभी से पहाड़ो में भी इस पर्व को बड़े धूमधाम से मनाया जाता है । वहीं कुछ लोग ये भी बताते है कि जंगल में एक वन्य कन्या रहती थी उसे एक राजकुमार से प्यार हो गया और वह जंगल छोड़ महल चली गई । उसके जाते ही जंगल के पेड़.पौधे मुरझाने लगेए नदियां सूखने लगीं और पहाड़ टूटने लगे। कुछ दिन बाद राजकुमारी की तबीयत खराब हुई उसने राजकुमार को जंगल वापिस जाने की गुजारिश की। राजकुमार ने उसकी बात नहीं मानी और कुछ दिन बाद उसकी मौत हो गई। अपने निधन से पहले राजकुमारी ने अपने पति को उसे उसी जंगल मे दफनाने के लिए कहा था। उन्होंने उसे वही दफनाया। और कुछ दिनों के बाद ही वहाँ नदियों में पानी फिर लबालब भर गयाएपेड़ पौधे हरे भरे हो गये और जिस स्थान पर राजकुमारी को दफनाया था ए उसी स्थान पर एक खूबसूरत पीले रंग का एक सुंदर फूल खिला है।जिसे फूल को श्फ्योंलीश् नाम दे दिया गया है और उसी की याद में पहाड़ में श्फूलों का त्यौहार यानी कि फूल देई पर्वश् मनाया जाता है और तब से श्फुलदेई पर्वश् उत्तराखंड में भी मनाया जाता हैशिक्षा और रोजगार के लिए पहाड़ों से दूर जाना लोगों की मजबूरी बन चुकी हैए जिसका नतीजा है कि अब पहाड़ धीरे.धीरे खाली होते जा रहे हैं। यहाँ के घर.गाँवो में सदियों से मनाए जाने वाले खुशियों और नव वर्ष के इस फुलारीध्फूलदेई पर्व को भी पलायन ने अपनी चपेट में ले लिया है। पहाड़ के कई गाँवो में अब इस त्यौहार को मनाने के लिए बच्चे ही नहीं हैं क्योंकि इन गाँवो में केवल कुछ बुजुर्ग ही बाकी रह गए हैंए जो बस खंडहरों के प्रहरी की तरह अपने घरों की रखवाली करते नजर आते हैं।उम्मीद है कि यह सभ्यता सोशल मीडिया तक सिमटने से पहले एक बार फिर जरूर गुलज़ार होगी। बसंत का यह त्यौहार उत्साह और उम्मीद का प्रतीक हैए शायद पहाड़ अपने बसंत के दूतों की चहचहाहट से फिर जरूर महकेगा। इस राजीय पर्व के रूप में मनाने की वकालत हैंण् आखिर हो भी क्यों नहीं! यह संसार का एक मात्र ऐसा बाल उत्सव है जो भारतीय संवतसर की शुरुआत भी करता है और फूलों को भी महत्ता प्रदान करता हैण् ये पहाड़ी जनमानस के भी बाल.ग्वाल हैं जिन्होंने पूरी देश दुनिया को फूलों की महत्तता समझाते हुए इन्हें देव चरणों में अर्पित करने की कला सिखाई हैण् एकमात्र गुलाब ही फुलदेई का ऐसा पुष्प जिसे पूर्व में घर की देहरियों में अर्पित नहीं किया जाता था और न ही मंदिरों में चढ़ाया जाता थाण् आज भी गुलाब जैसा पुष्प पहाड़ी अंचलों में परित्याज्य माना जाता हैण् ऐसा क्यों है इस पर शोध की आवश्यकता हैण् उत्तराखंड की संस्कृति को उजागर करता हैंए तो दूसरी ओर प्रकृति के प्रति पहाड़ के लोगों के सम्मान और प्यार को भी दर्शाता है। इसके अलावा पहाड़ की परंपराओं को कायम रखने के लिए भी यह पर्व त्योहार खास हैं। इस त्योहार को फूल संक्रांति भी कहा जाता हैए इसका सीधा संबंध प्रकृति से है। इस समय चारों ओर छाई हरियाली और नाना प्रकार के खिले फूल प्रकृति के यौवन में चार चांद लगाते है।
लेखक वर्तमान में दून विश्वविद्यालय कार्यरत हैं।