भटकते गजराज की कौन सुने फरियाद

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भटकते गजराज की कौन सुने फरियाद

डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला

चिलचिलाती धूप और उस पर सूखते जलस्रोत। ऐसे में गला तर करने को गजराज इधर से उधर तो भटकेंगे ही। आखिर प्रश्न जीवन से जुड़ा है, फिर इसके लिए चाहे कोई भी खतरा क्यों न मोल लेना पड़े।उत्तराखंड के जंगलों में भी यमुना से लेकर शारदा नदी तक लगभग साढ़े छह हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले हाथियों के बसेरे के आसपास की स्थिति भी इन दिनों ऐसी ही है।फिर चाहे वह कोटद्वार क्षेत्र हो अथवा राजाजी या कार्बेट टाइगर रिजर्व से लगे क्षेत्र, वहां गजराज अक्सर भटकते देखे जा रहे हैं और इसका एक ही कारण है पानी की तलाश। ऐसे में जगह-जगह मानव से उनका टकराव भी हो रहा है।यह परिदृश्य बताता है कि रखवालों ने जंगल में पानी की व्यवस्था के लिए कितने पुख्ता इंतजाम किए हैं। यदि गजराज की फरियाद को सही ढंग से सुना गया होता तो शायद यह स्थिति नहीं आती।जंगल में मोर नाचा किसने देखा, यदि रखवाले ही इस परिपाटी पर चलेंगे तो क्या होगा। वैसा ही होगा, जैसा कार्बेट टाइगर रिजर्व के कालागढ़ टाइगर रिजर्व वन प्रभाग में हुआ।जिस संरक्षित क्षेत्र में बगैर अनुमति के एक पत्ता, पत्थर तक नहीं उठाया जा सकता, वहां नियम-कायदों को ताक पर रखकर निर्माण कार्य करा दिए गए। यद्यपि, मामला उछलने पर जंगल में हुए अवैध निर्माण ध्वस्त किए जा चुके हैं।जांच पड़ताल के बाद अधिकारियों के विरुद्ध सख्त कार्रवाई भी की गई है, लेकिन प्रश्न उठता है कि ऐसी नौबत क्यों आई। यदि बाड़ ही खेत चरने लगेगी तो फिर भगवान ही मालिक है। ऐसे में हर स्तर पर गंभीरता से चिंतन-मनन की आवश्यकता है। न केवल शहरों और गांवों बल्कि जंगल से गुजरने वाली सड़कों के किनारे के दरख्त कराह रहे हैं। कहीं सीमेंट-कंक्रीट से सड़क बनने पर उनकी जड़ों तक पानी नहीं पहुंच पा रहा तो कहीं विभिन्न कारणों से इनके तने खोखले हो चले हैं। उत्तराखंड को अस्तित्व में आए 21 साल हो चुके हैं, लेकिन जंगल की आग की ऐसी चुनौती है, जिससे अभी तक पार नहीं पाई जा सका है। वह भी यह जानते हुए कि हर साल ही यहां जंगल धधकते हैं। आग की रोकथाम के लिए जिस तरह की ठोस रणनीति और उचित संसाधन चाहिए, उस मोर्चे पर अभी सुस्ती का आलम दिखता है। उत्तराखंड में सूखते जलस्रोत एक बड़ी समस्या बन चुके हैं। जनवरी 2019 में प्रकाशित एक Research के मुताबिक गर्मियों में पानी की कमी इंसानों और खेती के लिए बड़ी मुश्किल बन सकती है। स्टेट वार्ट बोर्ड की वेबसाइट पर दी गई जानकारी के मुताबिक पिछले तीन वर्षों में जल आपूर्ति के 500 में से 93 प्रोजेक्ट में वाटर डिस्चार्ड में 90 प्रतिशत तक की गिरावट आई है। इसी अंतराल में 268 वाटर प्रोजेक्ट्स में 75%-90% तक गिरावट आई है।पिछले कुछ समय में उत्तराखंड सरकार ने वन विभाग के ज़रिये जंगलों में पानी के स्रोतों को पुनर्जीवित करने के लिए तालाब और ट्रेंचेस बनाने के काम किए हैं। ताकि पानी की उपलब्धता सुनिश्चित की जा सके। हाथी भोजन, पानी और प्रजनन के लिए खास तरह के मार्ग से आवागमन करते हैं। हाल के कुछ सालों में हाथियों के कई बड़े और प्राकृतिक कॉरिडोर बंद हो गए हैं अथवा उनपर निर्माण आदि होने लगे हैं। रास्ते में रुकावट, भोजन और पीने के पानी की कमी के चलते वो आबादी क्षेत्र में घुस गए हैं। उनका आबादी वाले क्षेत्र में आने का मुख्य कारण जंगलों को लगातार कटान और उनकी सघनता कम होना भी है

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