वन पंचायतों के अधिकारों में लगातार की जा रही कटौती….?

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वन पंचायतों के अधिकारों में लगातार की जा रही कटौती….?

डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला

वन पंचायतों की व्यवस्था वाले देश के एकमात्र राज्य उत्तराखंड में वन पंचायत नियमावली की जटिलताओं को दूर
करने के लिए सरकार इसमें संशोधन करेगी। इसके तहत वन पंचायतों के गठन के लिए उपजिलाधिकारी की बजाए
किसी सक्षम अधिकारी को चुनाव अधिकारी बनाया जाएगा। यही नहीं, वन पंचायतों को क्रियाशील बनाने के
मद्देनजर इनकी संख्या में कटौती की जा सकती है। वर्तमान में वन पंचायतों की संख्या 12168 है। वन पंचायतों
में सरपंच के पदों पर 50 फीसद महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित करने के साथ ही सरकार अन्य कई कदम भी
उठाने जा रही है। यही नहीं, वन पंचायतों को मनरेगा के तहत 20 फीसद बजट मुहैया कराने पर भी सरकार जल्द
निर्णय लेगी। ऐसी व्यवस्था की जाएगी कि सभी वन पंचायतें क्रियाशील हों और वे वनों के संरक्षण-संव‌र्द्धन के
साथ ही ग्रामीणों को रोजगार देने में भी सक्षम हो सकें। कि वन पंचायतों के सरपंच पदों पर महिलाओं की 50
फीसद भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए रोस्टर बनाया जाएगा। वन पंचायतों को मान्यता तभी दी जाएगी, जब
सरपंच पदों पर 50 फीसद महिलाएं काबिज हों। उन्होंने यह भी जानकारी दी कि वन पंचायतों के क्षेत्रफल का
निर्धारण भी किया जाएगा। ऐसे में पुनर्गठन से इनकी संख्या कम हो सकती है।वित्त मंत्री ने कहा कि नियमावली में
वन पंचायतों को स्वायत्तता दी गई है। उसे अपने संसाधनों पर तो ध्यान देना ही होगा। साथ ही सरकार भी इसमें
पूर्ण सहयोग करेगी। मनरेगा के तहत बजट आवंटित करने भी सरकार हरसंभव प्रयास करेगी। अंग्रेजों के उत्तराखण्ड
में आगमन से पूर्व यहाँ की वन व्यवस्था मनुस्मृति के अनुसार संचालित होती थी। अर्थात जंगल सब की सम्पत्ति
था। राजा ‘कठबाँस’ या ‘घी कर’ जैसे कुछ कर अवश्य ले सकता था परन्तु जंगलों का प्रबन्ध स्थानीय जनता अपनी
जरूरतों के अनुसार किया करती थी। यही कारण रहा कि यहाँ लठ पंचायत जैसी व्यवस्था पनप पायी जिसमें जंगल
की सुरक्षा प्रत्येक दिन चक्रीय रूप से एक नये परिवार के पास हुआ करती थी। लोगों के लिए जंगल केवल कुछ वन
उत्पाद लेने तक सीमित नहीं था। वरन् व्यापक रूप से पशुपालन वाले समाज में वन, कृषि से जुड़कर जीवन-यापन
का सबसे बड़ा स्रोतथा।अंग्रेज वन-सम्पदा के कारण ही इस क्षेत्र के प्रति आकर्षित हुए थे और उत्तराखण्ड में अपने
राजनैतिक वर्चस्व से पूर्व ही उन्होंने अपना वन आधारित आर्थिक साम्राज्य कायम करना आरम्भ कर दिया था।
अपनी व्यावसायिक सोच के चलते ही अंग्रेजों ने वनों को सुरक्षित क्षेत्र में बदलना आरम्भ किया और जनता के
अधिकारों में व्यापक कटौतियाँ की जिसका प्रत्युत्तर यहाँ की जनता ने एक बड़े आंदोलन से दिया और अन्त में
अंग्रेजों को जंगलों का एक बड़ा हिस्सा स्थानीय जनता को वन पंचायत और सिविल वनों के रूप में प्रबंधन के लिए
वापस लौटाना पड़ा। परन्तु शेष वनों का प्रबंधन वन विभाग के माध्यम से व्यावसायिक दृष्टिकोण से किया जाता
रहा।आजादी के पश्चात् वनों के प्रबंधन की इस विभागीय व्यवस्था में परिवर्तन लाकर समस्त वनों को स्थानीय
जनता के माध्यम से प्रबंधित करने के बजाय लोगों के वन अधिकारों में कटौती का सिलसिला लगातार जारी रहा।
वर्तमान में उत्तराखण्ड के कुल वनक्षेत्र का एक चौथाई हिस्सा प्रतिबंधित क्षेत्र में आ चुका है। सेंक्चुरी, नेशनल पार्क
और बायोस्फेर रिजर्व के नाम पर लगातार लोगों के वन अधिकारों को छीना जा रहा है। वन संरक्षण अधिनियम
1980 के प्राविधानों के कारण तमाम विकास योजनाएं वर्षों से रुकी पड़ी हैं। वृक्ष संरक्षण अधिनियम जहाँ अपनी
कृषि भूमि में भी लोगों को पेड़ों के पातन से रोक देता है वहीं वन पंचायतें भी वन विभाग के हवाले कर सिविल
वनों में भी लोगों के हकों को प्रतिबंधित कर दिया गया है। इको सेंसिटिव जोन की तलवार लोगों के गले में
लगातार लटकी पड़ी है। इसके लागू होने के पश्चात् तो आधे से अधिक सुरक्षित जंगल प्रतिबंधित क्षेत्र में बदल
जायेंगे, जहाँ वन अधिकार तो दूर लोग अपनी कृषि भूमि में भी खेती या विकास कार्यों के लिए स्वतंत्र नहीं होंगे।

मूल प्रश्न वनाग्नि से अगर इस क्रम को जोड़कर देखें तो हमें इसका उत्तर मिल सकता है कि क्यों लोग लगातार
वनाग्नि के प्रति उदासीन होते जा रहे हैं। पहले की तरह अब सम्पूर्ण गाँव एक आवाज पर आग बुझाने के लिए उठ
खड़ा नहीं हो पा रहा है तो इसके कारणों की व्यापक पड़ताल करनी होगी।व्यावसायिक सोच के कारण उत्तराखण्ड के
मिश्रित वनों का स्थान तेजी से चीड़ के वन लेते जा रहे हैं। वर्तमान में चीड़ के वन लगभग 30 प्रतिशत वन क्षेत्र
को घेरे हुए हैं। चीड़ के वनों से गिरने वाला पिरूल गर्मियों में सूखकर अत्यन्त ज्वलनशीन हो जाता है। इस पिरूल
को हटाने या उपयोग में लाने का कोई कारगर तरीका अभी तक नहीं खोजा जा सका है। चीड़ के ही वनों से लीसा
भी निकलता है। यद्यपि लीसा टिपान के लिए नियम बनाये गये हैं परन्तु वन विभाग द्वारा लक्ष्य निर्धारित करने
और ठेकेदार द्वारा अधिक मुनाफा कमाने की प्रवृत्ति के कारण इन नियमों का पालन नहीं किया जाता। उत्तराखण्ड
के वन, मिटटी, पानी और पर्यावरण सहित जन और जानवर का भविष्य अगर सुरक्षित करना है तो वनो के प्रबंधन
की सामुदायिक परपरा को पुनः कायम करना ही होगा और वन विभाग की भूमिका कृषि विभाग की तरह सलाह
और शोध तक सीमित करनी होगी।

 ब्रिटिश हुकूमत के साथ लंबे संघर्ष के बाद हासिल और गौरवशाली इतिहास को
समेटे वन पंचायतें आज भारी संकट के दौर से गुजर रही हैं। एक तरफ नियमावली के जरिये वन पंचायतों के
अधिकारों में लगातार कटौती की जा रही हैं, वहीं दूसरी तरफ पंचायती वनों के विकास के लिए चलाई जाने वाली
विभिन्न योजनाएं कुछ चयनित वन पंचायतों में ही चलाई जा रही हैें। अधिकांश वन पंचायतों को कोई भी बजट
नहीं मिल पा रहा है। उन्होंने दावानल नियंत्रण के लिए वन विभाग द्वारा वन पंचायतों के साथ समन्वय स्थापित
करने के लिए कारगर कदम न उठाए जाने को दुर्भाग्यपूर्ण बताया। वन पंचायत की स्वायत्तता बहाल की जाए।
उन्होंने सरपंचों और पंचों को सम्मानजनक मानदेय देने, पंचायती वन का क्षेत्रफल गांव की आबादी एवं पशुधन के
आधार पर निर्धारित करने, दावानल नियंत्रण के लिए वन पंचायतों के साथ मिलकर कार्य योजना तैयार करने,
ब्लाक से लेकर राज्य तक परामर्शदात्री समितियों का गठन यथाशीघ्र करने, वन पंचायतों को नियमित वजट
उपलब्ध कराने, लीसा रायल्टी का भुगतान समय पर करने की मांग कीहै, वरिष्ठ पत्रकार और पर्यावरणविद कहते हैं
कि उत्तराखंड के गांवों की चार किलोमीटर परिधि में जंगलों से सरकारी कब्ज़ा हटा कर उन्हें ग्राम समुदाय के सुपुर्द
किया जाना चाहिए। मई-जून की गर्मियों में उत्तराखंड के जंगलों में आग सबसे ज्यादा फैलेगी और हेलीकॉप्टर से
पानी गिरा आग बुझाना इस समस्या का स्थाई समाधान नही है। न ही चीड़ के पेड़ों को काट-काट कर हम अपने
कृत्यों से लगी इस आग को रोक सकते हैं। समुदाय ने मिल कर ही मानव जाति का निर्माण किया है और वह ही
इसे और अपने पर्यावरण को बचा भी सकता है।

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