लेख का केंद्रीय तर्क यह है कि भारतीय संसद, जिसे कभी “लोकतंत्र का मंदिर” कहा जाता था, अब लगातार हंगामे, विरोध और व्यवधानों के कारण अपने मूल उद्देश्य—विचार-विमर्श और कानून निर्माण—से दूर होती जा रही है।
जब संसद में बहस के बजाय नारेबाजी और अव्यवस्था हावी हो जाती है, तो:
जनता का संसद पर भरोसा कम होता है
लोकतांत्रिक जवाबदेही कमजोर होती है
कानून बिना पर्याप्त चर्चा के पारित हो जाते हैं
संसद की प्रतिष्ठा और विश्वसनीयता को नुकसान होता है
संवैधानिक और कानूनी प्रावधान क्या कहते हैं?
लेख में स्पष्ट किया गया है कि संविधान और संसद के नियमों में पहले से ही अनुशासन बनाए रखने के लिए पर्याप्त शक्तियाँ मौजूद हैं:
1. अनुच्छेद 118
संसद को अपने कामकाज और आचरण को नियंत्रित करने के लिए नियम बनाने का अधिकार देता है।
2. अनुच्छेद 105
सांसदों को विशेषाधिकार देता है, लेकिन यह हिंसा, तोड़फोड़ या अव्यवस्था के लिए सुरक्षा नहीं देता।
3. अनुच्छेद 122
संसद की कार्यवाही में अदालत दखल नहीं दे सकती, जिससे संसद की स्वायत्तता सुनिश्चित होती है।
सुप्रीम कोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला (सीता सोरेन बनाम यूनियन ऑफ इंडिया, 2024)
सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा:
सांसद या विधायक रिश्वत लेने या अवैध आचरण के लिए विशेषाधिकार का दावा नहीं कर सकते
संसद में तोड़फोड़ या हिंसा संवैधानिक संरक्षण के दायरे में नहीं आती
विशेषाधिकार कानून से बचने का साधन नहीं है
यह फैसला संसद में जवाबदेही को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
संसद के पीठासीन अधिकारियों के पास उपलब्ध शक्तियाँ
लोकसभा और राज्यसभा के नियम स्पष्ट रूप से अनुशासन बनाए रखने की अनुमति देते हैं:
लोकसभा नियम 373, 374, 374A – सांसदों को निलंबित किया जा सकता है
राज्यसभा नियम 255 और 256 – अव्यवस्थित सदस्य को बाहर किया जा सकता है
गंभीर मामलों में निष्कासन (Expulsion) भी संभव है
लेकिन लेख का आरोप है कि इन शक्तियों का पर्याप्त उपयोग नहीं किया जा रहा।
लेख में सुझाए गए सुधार
लेखक ने कुछ ठोस सुझाव दिए हैं:
1. No Work, No Pay लागू किया जाए
जो सांसद जानबूझकर कार्यवाही बाधित करें, उनका भत्ता रोका जाए।
2. बिना बहस के कानून पास न हों
अगर 4 घंटे बहस नहीं होती, तो बिल को 30 दिन के लिए स्टैंडिंग कमेटी को भेजा जाए।
3. सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई
वेल में आने, कागज फाड़ने या नारेबाजी करने वाले सांसदों को तुरंत निलंबित किया जाए।
4. गलत या अप्रमाणित जानकारी पर कार्रवाई
अगर सांसद बिना प्रमाण के कोई दस्तावेज़ उद्धृत करे, तो उसे रिकॉर्ड से हटाया जाए।
मूल संदेश और चेतावनी
लेख का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यह है:
संसद बहस और विचार-विमर्श का मंच है, विरोध का नहीं
सरकार और विपक्ष दोनों की जिम्मेदारी है कि संसद को सुचारू रूप से चलने दें
लोकतंत्र में जनता का भरोसा सबसे महत्वपूर्ण है
महात्मा गांधी की चेतावनी का उल्लेख करते हुए लेख कहता है कि अगर लोकतंत्र में अनुशासन नहीं रहेगा, तो वह “Mobocracy” में बदल सकता है।
निष्कर्ष
यह लेख संसद की वर्तमान स्थिति पर एक गंभीर चेतावनी है।
यह बताता है कि समस्या कानून या संविधान की कमी नहीं है, बल्कि उन नियमों को लागू करने की इच्छाशक्ति की कमी है।
यदि संसद में अनुशासन, बहस और जवाबदेही बहाल नहीं की गई, तो लोकतंत्र की नींव कमजोर हो सकती है।
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