चंदा मांगकर नीलामी में खरीदा था स्‍कूल, ऐसे थे यूपी के पहले सीएम

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चंदा मांगकर नीलामी में खरीदा था स्कूल, ऐसे थे यूपी के पहले सीएम

डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला

पहाड़ी इलाकों को देश के राजनीतिक मानचित्र में जगह दिलाने वाले उत्तर प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री और भारत रत्न गोविद बल्लभ पंत का पैतृक गांव आज विकास की मुख्यधारा से कटता जा रहा है। अभावों में भारत रत्न के खूबसूरत के गांव खूंट से भी ग्रामीणों का पलायन बढ़ता जा रहा है।भारत रत्न पंडित गोविद बल्लभ पंत के पैतृक गांव के लोग बुनियादी सुविधाओं को तरस रहे हैं। ग्रामीण खूंट में मिनी स्टेडियम बनाने की मांग लंबे समय से करते आ रहे हैं, लेकिन धरातल पर कुछ नहीं हुआ। गांव में पेयजल समेत तमाम समस्याएं बनी हैं। उपेक्षा के चलते यहां के ग्रामीण आज भी कई समस्याओं से जूझ रहे हैं। अभावों से जूझते लोग गांव से लगातार पलायन कर रहे हैं। आइटीआइ खूंट में पर्याप्त ट्रेड नहीं है। क्षेत्र के युवाओं को तकनीकी शिक्षा का लाभ नहीं मिल रहा है। गांव के लोग महारुद्रेश्वर मंदिर को धार्मिक पर्यटन सर्किट से जोड़ने की मांग भी करते आ रहे हैं लेकिन अब तक इसके लिए भी कोई काम नहीं हुआ है। जंगली जानवरों ने खेतीबाड़ी भी चौपट कर दी। अब काश्तकार खेती करने में भी डरने लगे है। गोविन्द बल्लभ पंत जी की वकालत के बारे में कई किस्से मशहूर थे. उनका मुकदमा लड़ने का ढंग निराला था, जो मुवक्किल अपने मुकदमों के बारे में सही जानकारी नहीं देते थे, पंत जी उनका मुकदमा नहीं लेते थे.10 सितम्बर, 1887 को उत्तराखंड के अल्मोड़ा स्थित खूंट गाव में जन्में गोविंद बल्लभ पंत ने वर्ष 1905 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया और 1909 में उन्होंने कानून की परीक्षा उत्तीर्ण कीकाकोरी मुकद्दमें ने एक वकील के तौर पर उन्हें पहचान और प्रतिष्ठा दिलाई.गोविंद बल्लभ पंत जी महात्मा गांधी के जीवन दर्शन को देश की जनशक्ति में आत्मिक ऊर्जा का स्त्रोत मानते रहेगोविंद बल्लभ पंत जी ने देश के राजनेताओं का ध्यान अपनी पारदर्शी कार्यशैली से आकर्षित किया. भारत के गृहमंत्री के रूप में वह आज भी प्रशासकों के आदर्श हैं. पंत जी चिंतक, विचारक, मनीषी, दूरदृष्टा और समाजसुधारक थे. उन्होंने साहित्य के माध्यम से समाज की अंतर्वेदना को जनमानस में पहुंचाया. उनका लेखन राष्ट्रीय अस्मिता के पार्श्व चिन्हांकन द्वारा लोगों के समक्ष विविध आकार ग्रहण करने में सफल हुआ.उनके निबंध भारतीय दर्शन के प्रतिबिंब हैं. उन्होंने राष्ट्रीय एकता के लिए अपनी लेखनी उठाई. प्रबुद्ध वर्ग के मार्गदर्शक पंत जी ने सभी मंचों से मानवतावादी निष्कर्षों को प्रसारित किया. राष्ट्रीय चेतना के प्रबल समर्थक पंत जी ने गरीबों के दर्द को बांटा और आर्थिक विषमता मिटाने के अथक प्रयास किए.वर्ष 1937 में पंत जी संयुक्त प्रांत के प्रथम प्रधानमंत्री बने और 1946 में उत्तर प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री बने. 10 जनवरी, 1955 को उन्होंने भारत के गृह मंत्री का पद संभाला.सन 1957 में गणतन्त्र दिवस पर महान देशभक्त, कुशल प्रशासक, सफल वक्ता, तर्क के धनी एवं उदारमना पन्त जी को भारत की सर्वोच्च उपाधि भारतरत्न’ से विभूषित किया गया.हिन्दी को राजकीय भाषा का दर्जा दिलाने में भी गोविंद वल्लभ पंत जी का महत्वपूर्ण योगदान रहा. सात मार्च, 1961 को गोविंद बल्लभ पंत का निधन हो गया. पूर्वी और पश्चिमी पाकिस्तान से भारत पहुंचे लोगों को बसाने में भी अपना अहम योगदान दिया।पंडित पंत के ही प्रयासों से अविभाजित उत्तर प्रदेश का तराई क्षेत्र न केवल आबाद हुआ बल्कि तराई की भूमि ने पहले ग्रेनरी ऑफ यूपी और बाद में ग्रेनरी ऑफ इंडिया यानी उत्तर प्रदेश और देश का अनाज गोदाम के रूप में अपनी पहचान बनाई। लेकिन पंडित पंत ने इसके उलट कृषि के साथ साथ वनों को महत्व दिया। उन्हें पता था कि अगर वन सुरक्षित रहेंगे तभी खेती भी सुरक्षित रहेगी। ऐसा इसलिए क्योंकि एक हेक्टेयर भूमि में खेती के लिए कम से कम छह हेक्टेयर जंगल का होना जरूरी होता है। बताते हैं कि वर्ष 1878 में पहला फारेस्ट एक्ट आया जिसमें वन प्रबंधन की बात कही तो गई थी लेकिन अंग्रेज कृषि वैज्ञानिक वाल्कर ने कहा था कि खेती ज्यादा महत्वपूर्ण है वन नहीं। इसे लेकर इंग्लैंड तक की संसद में बहस हुई और उसके बाद भी खेती को ज्यादा महत्व दिया जाने लगा लेकिन आजादी के बाद पंडित पंत एग्रीकल्चर एंड फारेस्ट्री कांसेप्ट लेकर आए और उन्होंने खेती के साथ साथ वनों को भी उतना ही महत्व दिया। पंडित गोविंद बल्लभ पंत ने वर्ष 1922 में एक किताब लिखी फारेस्ट प्राब्लम इन कुमाऊं। यह किताब अंग्रेजों की वन नीति के खिलाफ थी। पंत की इस किताब से अंग्रेज खासे भयभीत हो गए। इसके बाद उन्होंने इस किताब पर प्रतिबंध लगा दिया गया। बाद में वर्ष 1980 में पंडित पंत की इस किताब को पुन: प्रकाशित किया गया। पंत जी ने ही पहली बार हिन्दी को भारत की राष्ट्रभाषा बनाने का आंदोलन भी चलाया था। उनके मुख्यमंत्रित्व काल की एक बड़ी रोचक घटना है. एक बार पंत सरकारी बैठक कर रहे थे. इस दौरान हुए नाश्ते का बिल पास होने जब उनके पास आया तो उन्होंने इसे पास करने से मना कर दिया. उनका तर्क था कि सरकारी बैठकों में सरकारी खर्चे से सिर्फ चाय मंगवाने का नियम है. ऐसे में सिर्फ चाय का बिल ही पास किया जा सकता है, नाश्ते का बिल नाश्ता मंगवाने वाले व्यक्ति को खुद देना होगा. यह सुनकर सभी अधिकारी चुप हो गए.पंत जी राजनीति के एक माहिर नेता थे। उनके अंदर वह राजनीतिक क्षमता थी जिससे कई राजनेताओं ने उनसे प्रेरणा ली।

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